दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़ित, जो आपराधिक कानूनी प्रक्रिया शुरू करता है, उसे आपराधिक कार्यवाही के हर चरण में शामिल होने का अधिकार है, जिसमें आरोपी की रेगुलर ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई भी शामिल है।

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि रेप केस में पीड़ित महिला को आरोपी को ज़मानत देने से पहले मौजूद रहने और अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने यह बात तब कही जब उसने ट्रायल कोर्ट का ज़मानत आदेश रद्द किया, क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने पीड़ित महिला को नोटिस नहीं भेजा। कोर्ट ने पीड़ित की बात सुनने के बाद ज़मानत अर्ज़ी पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया।

कोर्ट पीड़ित महिला की उस अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी, जिसके तहत IPC की धारा 376 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज FIR में आरोपी को रेगुलर ज़मानत दी गई।

कोर्ट ने BNSS की धारा 483(2) का ज़िक्र किया, जो कुछ खास यौन अपराधों के मामलों में ज़मानत अर्ज़ी की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता या उनके अधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी को अनिवार्य बनाती है।

इसने दिल्ली हाईकोर्ट के उस 'प्रैक्टिस डायरेक्शन' पर भी ध्यान दिया, जिसमें यह बताया गया कि शिकायतकर्ता को ज़मानत अर्ज़ी के बारे में कैसे सूचित किया जाना चाहिए।

जस्टिस बनर्जी ने 'जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही में पीड़ित के शामिल होने के अधिकार को मान्यता दी थी और ज़ोर दिया कि ऐसे अधिकार महत्वपूर्ण और लागू करने योग्य हैं।

कोर्ट ने 'सुश्री एक्स बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें फिर से कहा गया कि पीड़ित महिला के अपनी बात रखने के अधिकार को सिर्फ़ इसलिए कम नहीं किया जा सकता, क्योंकि कार्यवाही में राज्य का प्रतिनिधित्व है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

"इस मामले में पीड़ित महिला जैसी कोई भी पीड़ित, जिसने आरोपी के ख़िलाफ़ IPC की धारा 376/BNS की धारा 69 के तहत शिकायत दर्ज कराकर सरकारी मशीनरी को सक्रिय किया है, उसे आपराधिक कार्यवाही के सभी चरणों में शामिल होने का मौका दिया जाना चाहिए।"

इसमें आरोपी की नियमित ज़मानत की मांग भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के हालात को देखते हुए तीन दिन के अंदर नियमित ज़मानत देने का आदेश रद्द किया जाना चाहिए।

ऐसा करते हुए कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि वह आरोपी के मामले की मेरिट (गुण-दोष) की जांच नहीं कर रहा है। कोर्ट ने माना कि ज़मानत का आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता, क्योंकि शिकायतकर्ता महिला (Prosecutrix) को न तो नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का मौका दिया गया।

ज़मानत की अर्ज़ी को ट्रायल कोर्ट के पास नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया गया। निर्देश दिया गया कि शिकायतकर्ता महिला को सुनवाई का मौका देने के बाद, हो सके तो दो हफ़्ते के अंदर इस पर फ़ैसला लिया जाए।

कोर्ट ने कहा,

"हालांकि, मौजूदा तथ्यों और हालात को देखते हुए - और खासकर इसलिए क्योंकि जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसे सिर्फ़ इस सीमित वजह से रद्द किया जा रहा है कि ट्रायल कोर्ट शिकायतकर्ता महिला को नोटिस जारी करने में नाकाम रहा - जब तक ट्रायल कोर्ट इस मामले पर नए सिरे से फ़ैसला नहीं ले लेता, तब तक आरोपी को दोबारा गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा।"

Title: Ms G v. State NCT of Delhi & Anr

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