दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि शादी का झूठा वादा कर किसी महिला को यौन संबंध के लिए राजी करना अपराध हो सकता है लेकिन हर सहमति से बने संबंध को बाद में शादी के वादे के आरोप के आधार पर आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।

अदालत को यह जांचना होगा कि महिला की सहमति वास्तव में शादी के झूठे वादे से प्रभावित हुई, या संबंध दोनों वयस्कों की स्वतंत्र सहमति से बने थे।

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने दुष्कर्म और आपराधिक धमकी के आरोप में जेल में बंद एक व्यक्ति को नियमित जमानत देते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया।

अदालत ने कहा कि किसी पुरुष को शादी का झूठा आश्वासन देकर महिला को यौन संबंध के लिए तैयार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन साथ ही अदालत को यह भी सावधानी से देखना होगा कि दो वयस्कों के बीच बने संबंध वास्तव में झूठे वादे के कारण बने थे या वे पहले से ही सहमति पर आधारित थे।

जस्टिस कठपालिया ने कहा कि अपराध केवल ऐसे सहमति वाले यौन संबंध में बनता है, जिसकी सहमति झूठे विवाह के आश्वासन से प्रभावित हुई हो। महज सहमति से बने यौन संबंध को बाद में शादी के वादे के आरोप के आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता।

मामले में 29 वर्षीय महिला ने आरोप लगाया कि आरोपी ने उससे शादी का वादा किया और इसी भरोसे पर उसके साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। पुलिस के अनुसार, महिला की आरोपी से दिसंबर 2023 में उसके कार्यस्थल पर मुलाकात हुई। इसके बाद दोनों करीब आए और आरोपी ने कथित तौर पर उससे शादी का प्रस्ताव रखा।

अभियोजन के अनुसार आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसके दो बच्चे थे। महिला को जब उसकी शादी और बच्चों के बारे में पता चला तो आरोपी ने कथित तौर पर बताया कि उसकी पत्नी से तलाक की कार्यवाही चल रही है। इसके बावजूद दोनों के बीच संबंध जारी रहे।

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कहा कि शिकायतकर्ता एक वयस्क और नौकरी करने वाली महिला थी।

अदालत ने इस बात पर भी विचार किया कि वह आरोपी के साथ चार महीने से अधिक समय तक सहकर्मी के रूप में काम कर चुकी थी। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि उसे आरोपी के विवाहित होने की जानकारी नहीं हुई होगी।

अदालत ने यह भी देखा कि मार्च महीने की बातचीत में महिला ने आरोपी की पत्नी को धमकी दी थी, जबकि FIR मई 2026 में दर्ज कराई गई। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि दोनों के बीच बने संबंध सहमति से थे और वे शादी के झूठे वादे या धोखे से प्रभावित नहीं थे।

अदालत ने कहा,

“केवल ऐसे सहमति से बने यौन संबंध ही अपराध हैं, जो झूठे विवाह के आश्वासन से प्रभावित हों महज सहमति से बने यौन संबंध अपराध नहीं हैं।”

हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमे के अंत में निचली अदालत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर स्वतंत्र निष्कर्ष निकालेगी। जमानत देते समय हाईकोर्ट की प्रथम दृष्टया राय को मुकदमे के अंतिम फैसले का आधार नहीं माना जाएगा।

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी 15 मई से जेल में था और मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका था।

जमानत देते हुए उसे अभियोजन के किसी भी गवाह से किसी भी तरह संपर्क नहीं करने का निर्देश दिया गया। गवाहों से संपर्क करने की स्थिति में उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

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