POCSO Act बच्चे से क्रॉस एग्जामिनेशन पर रोक नहीं लगाता, लेकिन आक्रामक सवालों और चरित्र हनन से सुरक्षा जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act के तहत बाल गवाह से जिरह करने पर बचाव पक्ष को रोक नहीं है लेकिन मुकदमे के दौरान बच्चे को आक्रामक सवालों और चरित्र हनन से सुरक्षा देना जरूरी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की गरिमा की रक्षा का मतलब यह नहीं है कि बचाव पक्ष को उससे सवाल पूछने या अपने बचाव में जरूरी सुझाव देने से पूरी तरह रोक दिया जाए।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने दुष्कर्म और POCSO Act के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 342, 376(2)(आई) और 376(2)(एल) तथा POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया गया।
आरोप है कि आरोपी ने 11 वर्षीय नाबालिग लड़की को कई मौकों पर गलत तरीके से बंधक बनाकर रखा और उसके साथ गंभीर प्रवेशनात्मक यौन हमला किया। निचली अदालत ने उसे 12 वर्ष के कठोर कारावास और 12 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा कि POCSO Act और उसके तहत बनाए गए नियमों में बच्चे की सुरक्षा, सम्मान और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए कई प्रावधान हैं। इनका उद्देश्य बच्चे को आक्रामक पूछताछ और चरित्र हनन से बचाना है लेकिन इन्हें बचाव पक्ष की क्रॉस एग्जामिनेशन के अधिकार को पूरी तरह समाप्त करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
जस्टिस सुधा ने कहा,
“POCSO Act बच्चे को आक्रामक सवालों और चरित्र हनन से बचाता है लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि बचाव पक्ष बाल गवाह से सवाल नहीं पूछ सकता।”
मामले में पीड़िता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराते समय मैथिली बोली के केवल दो शब्द कहे थे। इन शब्दों का अनुवाद उसकी मां ने किया।
अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर कि नाबालिग को शपथ नहीं दिलाई गई या दुभाषिए को शपथ नहीं दिलाई गई, उसके बयान को स्वतः खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में आरोपी की हरकतों से संबंधित पर्याप्त सामग्री मौजूद थी। अदालत ने पीड़िता की गवाही को पूरी तरह पढ़ने के साथ-साथ उन इशारों को भी ध्यान में रखा, जिन्हें निचली अदालत ने उसके बयान के दौरान दर्ज किया। इन सभी परिस्थितियों से आरोपी की ओर से किए गए कृत्य की पुष्टि होती है।
अदालत ने यह भी कहा कि POCSO Act और वर्ष 2012 के नियमों में दिए गए सुरक्षा उपाय बच्चे की मदद और सुरक्षा के लिए हैं। यदि किसी मामले में विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य मौजूद हैं तो केवल तकनीकी आधार पर उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता, जब तक यह न दिखाया जाए कि प्रक्रिया की किसी कमी से आरोपी के साथ वास्तविक अन्याय या पूर्वाग्रह हुआ है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घटना से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को गवाह के रूप में पेश नहीं किया जाना अपने आप में अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने का आधार नहीं है। यदि अदालत के सामने मौजूद साक्ष्य विश्वसनीय और पर्याप्त हैं तथा दोष संदेह से परे साबित होता है तो सभी गवाहों की गवाही जरूरी नहीं है।
हालांकि हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यवाही में अपनाई गई एक प्रक्रिया को गलत बताया।
अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने बच्ची की कम उम्र और उसकी मानसिक उम्र करीब पांच वर्ष आंके जाने के आधार पर बचाव पक्ष की ओर से पूछे जाने वाले कुछ सवालों और सुझावों को पूरी तरह रोक दिया था।
बचाव पक्ष की ओर से बच्ची से यह सुझाव पूछे जाने थे कि कथित घटना हुई ही नहीं थी और उसने घटना के दौरान शोर नहीं मचाया तथा किसी को इसकी जानकारी नहीं दी। निचली अदालत ने यह कहते हुए इन सुझावों को रोक दिया था कि बच्ची उनके स्वरूप और अर्थ को समझने में सक्षम नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस तरीके को गलत माना और कहा कि निचली अदालत को सवालों को पूरी तरह रोकने के बजाय पॉक्सो अधिनियम की धारा 33(2) में निर्धारित प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
इस प्रावधान के तहत बच्चे से मुख्य परीक्षा, जिरह या दोबारा पूछताछ के दौरान पूछे जाने वाले सवाल पहले विशेष अदालत के समक्ष रखे जाते हैं और विशेष अदालत उन्हें बच्चे के सामने रखती है।
अदालत ने कहा,
“धारा 33 की उपधारा (2) में निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, न कि बचाव पक्ष को गवाह के सामने अपने सुझाव रखने से ही रोक दिया जाना चाहिए।”
हालांकि, इस प्रक्रियागत गलती के बावजूद हाईकोर्ट ने माना कि मामले में उपलब्ध ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर आरोपी की दोषसिद्धि कायम रखने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। इसलिए उसकी अपील खारिज की गई।