दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को एक PIL पर नोटिस जारी किया। इस PIL में कानूनी सहायता पाने के हकदार लोगों को मुफ़्त फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट की मदद देने के लिए एक सिस्टम बनाने की मांग की गई, ताकि वे 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' (BSA) की धारा 63 के तहत इलेक्ट्रॉनिक-सबूत सर्टिफ़िकेशन की ज़रूरतों को पूरा कर सकें।

चीफ़ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी (NALSA) और केंद्रीय कानून और न्याय मंत्रालय तथा गृह मंत्रालय से जवाब मांगा।

ज़ीशान अख़लाक और अमन भिड़े द्वारा दायर याचिका में कहा गया कि BSA की धारा 63 में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को स्वीकार्य बनाने के लिए एक कानूनी ढांचा बनाया गया, जिसके तहत तय सर्टिफ़िकेट में दो हिस्से होते हैं।

याचिका के अनुसार, जहां 'भाग A' को उस व्यक्ति द्वारा पूरा किया जाना है, जिसका इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या डिवाइस पर कानूनी नियंत्रण है, वहीं 'भाग B' के लिए किसी एक्सपर्ट द्वारा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड और संबंधित डिवाइस की जांच की ज़रूरत होती है।

PIL में तर्क दिया गया कि हालांकि पर्याप्त आर्थिक संसाधन वाला कोई व्यक्ति निजी तौर पर फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट की सेवा ले सकता है, लेकिन मुफ़्त कानूनी सहायता के हकदार लोग शायद ऐसा खर्च न उठा पाएं।

याचिका में कहा गया,

"कानूनी सहायता ढांचे के माध्यम से ऐसी विशेषज्ञता प्रदान करने के लिए किसी संस्थागत तंत्र के अभाव में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति उन कार्यवाही में काफी नुकसान की स्थिति में होता है, जहां इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर भरोसा किया जाना है या उन्हें चुनौती दी जानी है। इस प्रकार, कानूनी आवश्यकता उन लोगों के लिए व्यावहारिक रूप से पहुंच से बाहर हो जाती है जिनकी सुरक्षा के लिए कानूनी सहायता ढांचा बनाया गया।"

इसमें आगे कहा गया कि एक व्यवस्थित तंत्र होना चाहिए जिसके तहत कानूनी सहायता का पात्र व्यक्ति एक्सपर्ट की मदद ले सके, जब भी धारा 63 के अनुपालन के लिए ऐसी जांच की आवश्यकता हो।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मुफ़्त कानूनी सहायता के हकदार लोगों को फ़ोरेंसिक एक्सपर्ट की मदद देने के लिए किसी संस्थागत तंत्र का अभाव सीधे तौर पर न्याय तक सार्थक पहुंच के उनके अधिकार को प्रभावित करता है।

उन्होंने कहा,

"याचिकाकर्ता एक व्यवस्थित और एकसमान तंत्र चाहते हैं जिसके तहत कानूनी सहायता का पात्र व्यक्ति, जहां भी धारा 63 के अनुपालन के लिए एक्सपर्ट जांच की आवश्यकता हो, निजी खर्च उठाए बिना ऐसी मदद प्राप्त कर सके।"

यह याचिका एडवोकेट मोहम्मद इमरान अहमद के माध्यम से दायर की गई।

Title: Zeeshan Ekhlaque & Anr v. National Legal Services Authority & Ors

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