दिल्ली हाईकोर्ट ने एक लॉ स्टूडेंट की सज़ा में बदलाव किया, जिस पर यूरिनल के अंदर नकल करने का आरोप है। कोर्ट ने माना कि उसे 'संदेह का लाभ' (benefit of doubt) मिलना चाहिए, क्योंकि ऐसा कुछ भी साबित नहीं हुआ कि वह नकल के लिए सामान का 'असल में इस्तेमाल' कर रहा था, इसलिए सेमेस्टर के सभी पेपर रद्द करने की सज़ा बहुत ज़्यादा थी।

आरोप था कि याचिकाकर्ता भारतीय न्याय संहिता (BNS) की परीक्षा के दौरान वॉशरूम गया, जहां एक प्रोफेसर ने उसे यूरिनल का इस्तेमाल करते हुए एक पर्ची से नकल करते हुए पकड़ा। सज़ा के तौर पर यूनिवर्सिटी ने याचिकाकर्ता को अगले सेमेस्टर के अंत तक यूनिवर्सिटी की किसी भी परीक्षा में बैठने से रोक दिया।

याचिकाकर्ता ने अपील की और रिव्यू कमेटी ने 13.05.2025 के ईमेल के ज़रिए याचिकाकर्ता की सज़ा को क्लॉज़ 'C' से बदलकर क्लॉज़ 'B' कर दिया, यानी मौजूदा सेमेस्टर में उम्मीदवार के सभी पेपर रद्द कर दिए गए। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता हाई कोर्ट गया।

इस बीच प्रतिवादी यूनिवर्सिटी ने उन सभी विषयों में याचिकाकर्ता का रिज़ल्ट घोषित कर दिया, सिवाय उस विषय के जिसमें याचिकाकर्ता पर अनुचित साधनों (नकल) का इस्तेमाल करने का आरोप था, यानी LB-104 (BNS)।

जस्टिस जसमीत सिंह ने परीक्षा के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया और जांच रिपोर्ट देखी। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट के अनुसार, उस प्रोफेसर का कोई बयान कोर्ट को नहीं दिखाया गया, जो याचिकाकर्ता के पीछे वॉशरूम गया था, जिसमें यह कहा गया हो कि "याचिकाकर्ता यूरिनल में सामान का इस्तेमाल करते हुए पाया गया था"।

कोर्ट ने कहा,

"मेरा मानना ​​है कि जांच की कार्यवाही में लागू होने वाला पैमाना 'संभावनाओं की अधिकता' (Preponderance of Probability) का है, न कि आपराधिक मुकदमे की तरह 'उचित संदेह से परे' (Beyond Reasonable Doubt) किसी तथ्य को साबित करने का। मेरी राय में पूरे सेमेस्टर के पेपर रद्द करना सही अनुपात में नहीं है, क्योंकि 'संभावनाओं की अधिकता' के आधार पर भी यह साबित नहीं हुआ कि याचिकाकर्ता पेपर में नकल करने के लिए सामान का इस्तेमाल करते हुए पाया गया।"

कोर्ट ने आगे कहा कि गाइडलाइंस के क्लॉज़ 'B' के तहत सज़ा देना एक बड़ी सज़ा है, जिसका याचिकाकर्ता के एकेडमिक करियर पर काफ़ी असर पड़ता है। इसलिए इनविजिलेटर (निरीक्षक) को आरोपी कैंडिडेट को असल में "मटीरियल का इस्तेमाल करते हुए" देखना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"जांच रिपोर्ट को देखने से ऐसा लगता है कि नकल का सामान वॉशरूम में मिला और रिपोर्ट में ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे पता चले कि छात्र उस सामान का 'असल में इस्तेमाल' करते हुए पकड़ा गया, जैसा कि क्लॉज़ 'B' में ज़रूरी है। इसलिए याचिकाकर्ता को संदेह का लाभ (benefit of doubt) मिलना चाहिए।"

इस तरह कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता लागू गाइडलाइंस की कैटेगरी 'A' में आता है – यानी उस खास पेपर को रद्द करना जिसमें छात्र ने ऐसा काम या व्यवहार किया हो – और सज़ा भी उसी हिसाब से दी जाएगी।

याचिका का निपटारा किया गया।

Case title: X v/s UNIVERSITY OF DELHI

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