दिल्ली हाईकोर्ट ने सीनियर एडवोकेट के पदनाम की प्रक्रिया में बदलाव करते हुए नए नियम अधिसूचित किए। हाईकोर्ट ने 3 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन नियम 2026 अधिसूचित किए। नए नियम सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन की पूरी प्रक्रिया के लिए नया ढांचा तय करते हैं और मार्च 2024 में अधिसूचित नियमों का स्थान लेते हैं।

नए नियम दिल्ली हाईकोर्ट अधिनियम 1966 की धारा 7 और एडवोकेट एक्ट 1961 की धारा 16(2) के तहत बनाए गए। इसके तहत सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन की प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्थायी सचिवालय बनाया जाएगा। इसकी अध्यक्षता रजिस्ट्रार स्तर का अधिकारी करेगा।

स्थायी सचिवालय सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन के लिए प्रक्रिया कम से कम साल में एक बार शुरू करेगा। इसके तहत इच्छुक वकीलों से आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। आवेदन से संबंधित सूचना हाईकोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित की जाएगी और दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन को भी इसकी जानकारी दी जाएगी।

नियमों के अनुसार आवेदन जमा करने के लिए वकीलों को कम-से-कम 21 दिन का समय दिया जाएगा। सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन के इच्छुक वकील को नियमों के साथ संलग्न निर्धारित प्रारूप में आवेदन करना होगा।

नए नियमों के तहत सामान्य तौर पर वही वकील सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन के लिए पात्र होगा, जिसने कम-से-कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस की हो, एडवोकेट एक्ट के तहत गठित बार काउंसिल में नामांकित हो और मुख्य रूप से हाईकोर्ट, अधीनस्थ एवं जिला अदालतों या विशेष न्यायाधिकरणों में प्रैक्टिस करता रहा हो। इसके अलावा, वकील की उम्र 40 वर्ष होनी चाहिए। हालांकि, पूर्ण अदालत उम्र की इस शर्त में छूट दे सकती है।

न्यूनतम प्रैक्टिस अवधि की शर्त दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवा के उन पूर्व अधिकारियों पर लागू नहीं होगी, जिनके पास दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी के रूप में या बार में वकालत का कुल 10 वर्ष का अनुभव नहीं है।

नियमों में सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन के लिए प्रचार या व्यक्तिगत रूप से समर्थन जुटाने की कोशिश को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान किया गया। डेजिग्नेशन के लिए नामित वकील द्वारा प्रचार किए जाने पर उसे प्रक्रिया से अयोग्य कर दिया जाएगा।

किसी पात्र एडवोकेट के नाम पर पूर्ण अदालत स्वयं भी विचार कर सकती है, लेकिन इसके लिए संबंधित वकील की सहमति जरूरी होगी। इसके अलावा, वकील स्वयं आवेदन देकर भी डेजिग्नेशन के लिए विचार किए जाने का अनुरोध कर सकता है।

आवेदन मिलने के बाद स्थायी सचिवालय सभी आवेदकों के नाम हाईकोर्ट की वेबसाइट पर प्रकाशित करेगा। इसके बाद संबंधित पक्षों और हितधारकों से चार सप्ताह के भीतर सुझाव और राय मांगी जाएगी। विशेष न्यायाधिकरणों, अधीनस्थ अदालतों या जिला अदालतों में प्रैक्टिस करने वाले वकीलों के मामलों में संबंधित न्यायाधिकरण के अध्यक्ष और प्रधान जिला एवं सत्र जज की राय भी ली जा सकती है।

इसके बाद स्थायी सचिवालय सभी आवेदकों से संबंधित जानकारी और दस्तावेजों का संकलन कर एक विवरण तैयार करेगा। पात्र आवेदनों को संबंधित दस्तावेजों के साथ चीफ जस्टिस की मंजूरी के बाद पूर्ण अदालत के समक्ष रखा जाएगा।

सीनियर एडवोकेट के पदनाम पर निर्णय लेते समय पूर्ण अदालत वकील की पेशेवर और व्यक्तिगत आचरण से जुड़ी कई बातों पर विचार कर सकती है। इनमें अदालत में मामलों की पैरवी के दौरान निष्पक्ष व्यवहार, जज और बार के सदस्यों के प्रति सम्मानजनक आचरण, अदालत की गरिमा और अनुशासन बनाए रखना तथा मुवक्किल के प्रतिनिधि के साथ-साथ अदालत के अधिकारी के रूप में अपनी भूमिका निभाना शामिल है।

नियमों में कहा गया कि फुल कोर्ट को अपने निर्णय के कारण दर्ज करना अनिवार्य नहीं होगा। हालांकि, प्रक्रिया को समावेशी बनाने के लिए बार के विभिन्न वर्गों से आने वाले सदस्यों को समान अवसर देने और पहली पीढ़ी के वकीलों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जा सकता है।

फुल कोर्ट पहले सर्वसम्मति से निर्णय लेने का प्रयास करेगी। यदि सर्वसम्मति नहीं बनती है तो मतदान के जरिए फैसला लिया जा सकता है। किसी मामले में गुप्त मतदान कराया जाए या नहीं, इसका निर्णय पूर्ण अदालत करेगी। मतदान की स्थिति में प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने वाले जजों में से दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा। अंतिम निर्णय की जानकारी सभी आवेदकों को व्यक्तिगत रूप से दी जाएगी।

पूर्ण अदालत द्वारा किसी वकील के नाम को मंजूरी दिए जाने के बाद चीफ जस्टिस एडवोकेट एक्ट की धारा 16(2) के तहत संबंधित वकील को सीनियर एडवोकेट के रूप में नामित करेंगे।

यदि किसी वकील के नाम पर पूर्ण अदालत ने अनुकूल निर्णय नहीं लिया तो वह निर्णय की तारीख से दो वर्ष तक सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन के लिए दोबारा सिफारिश किए जाने के योग्य नहीं होगा।

नए नियमों में सीनियर एडवोकेट डेजिग्नेशन वापस लेने का प्रावधान भी रखा गया। यदि पूर्ण अदालत की राय में किसी सीनियर एडवोकेट का आचरण ऐसा पाया जाता है कि वह इस डेजिग्नेशन को जारी रखने के योग्य नहीं है तो पूर्ण अदालत उसका डेजिग्नेशन वापस ले सकती है। हालांकि, ऐसा निर्णय लेने से पहले संबंधित वकील को अपना पक्ष रखने का अवसर देना अनिवार्य होगा।

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