SSC Recruitment | उम्मीदवार द्वारा स्वतंत्र रूप से प्राप्त मेडिकल राय, नए मेडिकल टेस्ट का आधार नहीं बन सकती: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-03-17 13:49 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) का आदेश रद्द किया, जिसमें स्टाफ सिलेक्शन कमीशन (SSC) द्वारा आयोजित कांस्टेबल (एग्जीक्यूटिव) पद की भर्ती प्रक्रिया के दौरान मेडिकल रूप से अनफिट घोषित किए गए एक उम्मीदवार का फिर से मेडिकल टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया।

जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीज़न बेंच ने फैसला सुनाया कि भर्ती नियमों के तहत गठित विशेषज्ञ बोर्डों की मेडिकल राय में दखल देते समय अदालतों को संयम बरतना चाहिए, और वे केवल स्वतंत्र रूप से प्राप्त मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर बार-बार मेडिकल टेस्ट कराने का निर्देश नहीं दे सकतीं।

यह मामला तब सामने आया जब संबंधित उम्मीदवार ने कांस्टेबल (एग्जीक्यूटिव) के पद पर नियुक्ति के लिए SSC द्वारा आयोजित भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया। चयन के शुरुआती चरण पास करने के बाद 25 जनवरी 2024 को उसका विस्तृत मेडिकल टेस्ट (DME) हुआ, जिसके दौरान मेडिकल बोर्ड ने उसके बाएं पैर में वैरिकोज वेन्स (नसों की समस्या) के कारण उसे मेडिकल रूप से अनफिट घोषित कर दिया।

इसके बाद उम्मीदवार ने रिव्यू मेडिकल टेस्ट (RME) की मांग की, जो 31 जनवरी 2024 को आयोजित किया गया। रिव्यू मेडिकल बोर्ड ने स्वतंत्र रूप से उसकी स्थिति का आकलन किया और DME के ​​निष्कर्षों से सहमति जताते हुए उसे नियुक्ति के लिए फिर से मेडिकल रूप से अनफिट घोषित कर दिया।

इसके बाद उम्मीदवार ने 30 मार्च 2024 को एक सरकारी अस्पताल से एक मेडिकल सर्टिफिकेट प्राप्त किया, जिसमें कहा गया कि वह प्रतियोगी या गैर-प्रतियोगी परीक्षाओं में हिस्सा लेने के लिए मेडिकल रूप से फिट है। इस सर्टिफिकेट पर भरोसा करते हुए उसने भर्ती अधिकारियों के फैसले को चुनौती देते हुए CAT का दरवाजा खटखटाया।

ट्रिब्यूनल ने उम्मीदवार की याचिका स्वीकार की और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे एक नए गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा उसका फिर से मेडिकल टेस्ट करवाएं।

इस आदेश को चुनौती देते हुए SSC ने हाईकोर्ट का रुख किया।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अनुशासित सेवाओं में भर्ती के दौरान मेडिकल फिटनेस से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित होता है।

कोर्ट ने कहा,

“मेडिकल बोर्ड या रिव्यू मेडिकल बोर्ड की राय में दखल देना केवल कुछ सीमित स्थितियों में ही स्वीकार्य है, जैसे कि जहां तय प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ हो, DME और RME के ​​नतीजों में कोई साफ़ अंतर हो, या जहां संबंधित स्थिति की जाँच किसी ऐसे विशेषज्ञ से करवाना ज़रूरी हो जो बोर्ड का हिस्सा न रहा हो।”

इस मामले में कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी की मेडिकल स्थिति के बारे में DME और RME की मेडिकल राय में पूरी तरह से एकमत था।

कोर्ट ने कहा,

“यह ऐसा मामला नहीं है, जहां दोनों मेडिकल बोर्ड के नतीजे एक-दूसरे से मेल न खाते हों या विरोधाभासी हों, जिससे मूल्यांकन की सटीकता पर कोई जायज़ शक पैदा हो। इसके विपरीत दोनों बोर्ड ने एकमत से पाया है कि प्रतिवादी उसी मेडिकल स्थिति से पीड़ित है, जिसके कारण वह लागू भर्ती मानकों के अनुसार नियुक्ति के लिए अयोग्य है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि किसी उम्मीदवार द्वारा निजी या अन्य अस्पतालों से स्वतंत्र रूप से प्राप्त की गई मेडिकल राय अपने आप में दोबारा मेडिकल जांच का आदेश देने का कोई वैध आधार नहीं बन सकती।

कोर्ट ने कहा,

“इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि उक्त प्रमाण पत्र प्रतिवादी ने अपनी मर्ज़ी से प्राप्त किया, न कि भर्ती प्रक्रिया के दौरान मेडिकल बोर्ड द्वारा किए गए किसी निर्देश के तहत। 28. ऐसी परिस्थितियों में किसी उम्मीदवार को स्वतंत्र रूप से प्राप्त मेडिकल प्रमाण पत्रों के आधार पर बार-बार मेडिकल जाँच की माँग करने की अनुमति देना, भर्ती प्रक्रिया की निश्चितता और अंतिम स्वरूप को कमज़ोर करेगा।”

इस प्रकार, कोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने न्यायिक समीक्षा की स्वीकार्य सीमाओं का उल्लंघन किया और एक नए मेडिकल बोर्ड के गठन का आदेश देने वाला विवादित आदेश रद्द किया।

Case title: SSC v. Yashpal Singh

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