समझौते के बाद हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट की FIR रद्द, चार आरोपियों को पर्यावरण संगठन को एक-एक लाख रुपये देने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने पक्षकारों के बीच आपसी समझौता होने के बाद हत्या के प्रयास और आर्म्स एक्ट सहित अन्य धाराओं में दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। हालांकि, FIR रद्द करने की शर्त के तौर पर कोर्ट ने चारों आरोपियों को चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप को 25-25 हजार रुपये देने का निर्देश दिया। यानी कुल एक लाख रुपये पर्यावरण संगठन को देने होंगे।
जस्टिस अमित बंसल ने कहा कि शिकायतकर्ता को लगी चोट की प्रकृति सामान्य थी पक्षकारों ने स्वेच्छा से विवाद सुलझा लिया और समझौता कार्यवाही के शुरुआती चरण में ही हो गया। ऐसे में यह मामला हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए उपयुक्त है।
यह FIR जून 2024 में पालम विलेज थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 506 (आपराधिक धमकी) और 34 (साझा मंशा) के साथ आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत दर्ज की गई।
अभियोजन के अनुसार, विवाद की शुरुआत पैसों के लेनदेन को लेकर हुई। आरोप है कि आरोपी शिकायतकर्ता के घर पहुंचे, जहां विवाद के दौरान कहासुनी और झगड़ा हुआ। आरोप यह भी था कि आरोपियों में से एक ने अपने बॉडीगार्ड को बुलाया, जिसने लाइसेंसी हथियार से गोली चलाई। इनमें से एक गोली शिकायतकर्ता अरशद खान को लगी। मामले में धमकी देने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के भी आरोप लगाए गए।
दिल्ली पुलिस ने FIR रद्द करने की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि मामले में धारा 307 जैसे गंभीर अपराध का आरोप है। हालांकि, जस्टिस अमित बंसल ने कहा कि केवल धारा 307 का इस्तेमाल कर दिया जाना ही हाईकोर्ट को समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की संभावना पर विचार करने से नहीं रोकता।
कोर्ट ने शिकायतकर्ता की मेडिकल-लीगल रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया, जिसमें चोट को साधारण कुंद चोट बताया गया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि घटना में इस्तेमाल किया गया हथियार लाइसेंसी था।
शिकायतकर्ता और घायल व्यक्ति कोर्ट के समक्ष पेश हुए और उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के बीच समझौता स्वेच्छा से हुआ है, इसमें किसी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं थी और उन्हें FIR रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि पक्षकार एक-दूसरे को जानते हैं और उन्होंने स्वेच्छा से अपना विवाद सुलझा लिया है। समझौता भी कार्यवाही के शुरुआती चरण में हुआ है, जब आरोपपत्र हाल ही में दाखिल हुआ है और मुकदमे की सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई। शिकायतकर्ता और घायल व्यक्ति ने भी स्पष्ट रूप से कहा कि वे मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा और इससे सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा। इसके बाद कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी परिणामी कार्यवाहियों को रद्द किया।
कोर्ट ने चारों आरोपियों को 25-25 हजार रुपये चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप को देने का निर्देश देते हुए कहा कि अनुपालन रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर रजिस्ट्री के समक्ष दाखिल की जाए।