एक बार प्रोबेट मिल जाने के बाद धारा 68 के तहत वसीयत को दोबारा साबित करने की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-05-23 04:29 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि एक बार किसी वसीयत के संबंध में प्रोबेट मिल जाने के बाद भारतीय साक्ष्य अधिनियम की (Indian Evidence Act) धारा 68 के तहत बाद की सिविल कार्यवाही में उस दस्तावेज़ को दोबारा साबित करने की ज़रूरत नहीं होती।

धारा 68 में यह प्रावधान है कि यदि किसी दस्तावेज़ को कानून के अनुसार अटेस्ट (साक्षी द्वारा प्रमाणित) किया जाना ज़रूरी है (जैसे वसीयत या दान पत्र), तो उसे अदालत में तब तक सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे निष्पादित किए जाने को साबित करने के लिए कम-से-कम एक अटेस्ट करने वाले गवाह को न बुलाया जाए।

इस मामले के अनुसार, अपीलकर्ता के दादा, स्वर्गीय प्रभु नाथ सिंह ने 26 जून, 2007 को एक रजिस्टर्ड वसीयत निष्पादित की थी। वसीयत में यह प्रावधान था कि "बैंकों और/या डाकघर में खोले गए संयुक्त खातों में जमा नकद राशि, विशेष रूप से संबंधित संयुक्त खाताधारक को ही मिलेगी और उसी पर उसका अधिकार होगा।"

1 अगस्त, 2009 को उनकी मृत्यु के बाद अपीलकर्ता और उसकी माँ के बीच जॉइंट बैंक अकाउंट में जमा राशि को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। माँ ने दावा किया कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय खाते में ₹17.98 लाख जमा थे, और उसने वसीयत के प्रावधानों के अनुसार 50% हिस्से की मांग की।

हाईकोर्ट के समक्ष बेटे ने यह तर्क दिया कि वसीयत को साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के अनुसार साबित नहीं किया गया, क्योंकि किसी भी अटेस्ट करने वाले गवाह की गवाही नहीं ली गई।

इस तर्क को खारिज करते हुए अदालत ने यह टिप्पणी की कि वसीयत का प्रोबेट पहले ही पिछली कार्यवाहियों में हो चुका था, जिनमें दोनों पक्ष शामिल थे।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने फैसला दिया,

"एक बार प्रोबेट मिल जाने के बाद प्रोबेट संबंधी निर्णय 'इन रेम' (सभी पर बाध्यकारी) के रूप में प्रभावी होता है और वसीयत को दोबारा साबित करने की ज़रूरत नहीं होती।"

अदालत ने आगे यह भी टिप्पणी की कि जॉइंट बैंक अकाउंट से संबंधित मुख्य खंड "स्पष्ट और असंदिग्ध" था, और उसका स्पष्ट आशय यह था कि वह राशि जीवित संयुक्त खाताधारकों को ही मिले।

अदालत ने अपीलकर्ता की इस आपत्ति को भी खारिज किया कि यह मुकदमा परिसीमा (limitation) के कारण वर्जित था।

अदालत ने फैसला दिया कि मुकदमा दायर करने का अधिकार तभी उत्पन्न हुआ, जब माँ ने वसीयत के तहत अपने अधिकार का दावा किया और उस दावे को अस्वीकार कर दिया गया या उसका सम्मान नहीं किया गया; न कि केवल इस आधार पर कि उसे बैंक खाते के संचालन की जानकारी थी।

तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।

Case title: Mr. Dileep Singh v. Smt. Girija Devi

Tags:    

Similar News