नाबालिग की अश्लील सामग्री ऑनलाइन डालना गंभीर अपराध, नुकसान सजा से कहीं अधिक: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-14 10:56 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि नाबालिग की अश्लील तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर डालना बेहद गंभीर अपराध है, जिसका प्रभाव केवल कानूनी सजा तक सीमित नहीं रहता बल्कि पीड़िता के जीवन पर गहरा और स्थायी असर डालता है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को जमानत देने से इनकार किया।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा कि डिजिटल युग में एक बार ऐसी सामग्री इंटरनेट पर अपलोड हो जाए तो वह तेजी से फैल जाती है और उस पर नियंत्रण पाना लगभग असंभव हो जाता है।

अदालत ने कहा,

“ऐसी हरकतों से पीड़िता की गरिमा, निजता और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जो लंबे समय तक बना रहता है।। उसके भविष्य तथा सामाजिक जीवन को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।”

यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और की धारा 506 के साथ-साथ POCSO Act के तहत दर्ज किया गया। आरोप है कि आरोपी ने नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया और बाद में उसकी अश्लील तस्वीरें व वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर दिए।

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी ने पीड़िता के नाम से फर्जी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाकर उन पर आपत्तिजनक सामग्री अपलोड की। अदालत ने माना कि आरोपी की भूमिका केवल रिकॉर्डिंग तक सीमित नहीं थी बल्कि उसने सक्रिय रूप से सामग्री प्रसारित भी की।

अदालत ने यह भी कहा कि सह-आरोपी को पहले जमानत मिल चुकी है, लेकिन वर्तमान आरोपी का मामला अलग है, क्योंकि उस पर यौन शोषण और ऑनलाइन प्रसारण के दोहरे आरोप हैं। इसलिए उसे समानता के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट ने पाया कि जांच के दौरान जुटाए गए तकनीकी साक्ष्य और स्क्रीनशॉट प्रथम दृष्टया आरोपी की संलिप्तता को दर्शाते हैं।

इन्हीं तथ्यों को देखते हुए अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता आरोपी की भूमिका और मामले की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस चरण पर जमानत देना उचित नहीं है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश को मामले के अंतिम निर्णय के रूप में नहीं माना जाएगा।

Tags:    

Similar News