अगर मुद्दों को तय करने से पहले क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति नहीं उठाई जाती तो उसे छोड़ दिया गया माना जाएगा: दिल्ली हा कोर्ट ने वाद-पत्र लौटाने का आदेश रद्द किया

Update: 2026-03-27 04:08 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने यह साफ़ किया कि क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति को तब छोड़ दिया गया माना जाएगा, अगर उसे शुरुआती चरण में, खासकर मुद्दों को तय करने से पहले नहीं उठाया जाता। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें इसी आधार पर वाद-पत्र (Plaint) लौटा दिया गया।

जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने इस तरह वादी (Plaintiff) द्वारा दायर एक अपील को मंज़ूरी दी। इस अपील में CPC के आदेश VII नियम 10 के तहत पारित आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत ट्रायल कोर्ट ने क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र की कमी के आधार पर वाद-पत्र को सही कोर्ट के सामने पेश करने के लिए लौटाने का निर्देश दिया था।

बेंच ने टिप्पणी की कि इसमें कोई शक नहीं है कि CPC के आदेश VII नियम 10 के तहत आवेदन कोर्ट को यह अधिकार और क्षमता देता है कि वह वाद-पत्र को "मुकदमे के किसी भी चरण में" उस कोर्ट को लौटा दे, जिसमें मुकदमा दायर किया जाना चाहिए था।

"शब्द 'मुकदमे के किसी भी चरण में' का मतलब यह होगा कि ट्रायल शुरू होने और खत्म होने के बाद भी, लेकिन फ़ैसला सुनाए जाने से पहले। न तो सहमति और न ही छूट (Waiver) अधिकार क्षेत्र की अंतर्निहित कमी के दोष को ठीक कर सकती है, और पक्षों की सहमति किसी ऐसे कोर्ट को अधिकार क्षेत्र प्रदान करने का काम नहीं कर सकती, जिसके पास उस मामले की सुनवाई करने की क्षमता ही न हो।"

हालांकि, उसी के साथ-साथ कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र को कोर्ट द्वारा हमेशा तब मान लिया जा सकता है, जब CPC की धारा 21 में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर संबंधित पक्ष द्वारा ऐसी आपत्ति को छोड़ दिया जाता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया,

"CPC की धारा 21 से स्वतंत्र रूप से भी एक प्रतिवादी (Defendant) क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र में कमी के संबंध में आपत्ति को छोड़ सकता है। बाद में उसे वह आपत्ति उठाने से रोक दिया जाएगा।"

इस मामले में विजय कुमार ओझा बनाम सैमसंग इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स प्राइवेट लिमिटेड (2025) मामले का हवाला दिया गया। इस मामले में हाईकोर्ट ने जब वह इसी तरह के एक मुद्दे पर सुनवाई कर रहा था, यह निष्कर्ष निकाला था कि प्रतिवादी ने पहले कोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। इस पहलू पर कोई मुद्दा भी तय नहीं किया गया; इसलिए उसे बाद में वह आपत्ति उठाने से रोक दिया गया।

मौजूदा मामले में विवाद ₹10 लाख की वसूली के लिए दायर एक दीवानी मुकदमे से जुड़ा था। वादी ने दावा किया कि उसने यह रकम एक 'दोस्ताना कर्ज़' (Friendly Loan) के तौर पर दी थी। आरोप है कि यह रकम वादी के दिल्ली स्थित बैंक खाते से ट्रांसफर की गई और प्रतिवादी द्वारा जारी किया गया पुनर्भुगतान चेक भी दिल्ली में ही पेश किया गया, जो बाद में 'बाउंस' (अस्वीकृत) हो गया। इस प्रकार, वादी ने यह दावा किया कि वाद-कारण का एक हिस्सा दिल्ली के भीतर उत्पन्न हुआ, जिससे वहां की अदालतों को क्षेत्राधिकार प्राप्त हो गया।

हालांकि, प्रतिवादी ने बाद में CPC के आदेश VII नियम 10 के तहत एक आवेदन प्रस्तुत किया, जिसमें इस आधार पर वाद-पत्र की वापसी की मांग की गई कि यह लेन-देन कर्नाटक से जुड़ा था—जहां प्रतिवादी निवास करता था और जहां कुछ दस्तावेज़ निष्पादित किए गए थे। विचारण न्यायालय ने इस आवेदन को स्वीकार कर लिया।

हाईकोर्ट के समक्ष यह बात उठाई गई कि प्रतिवादी ने अपने लिखित बयान में क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई, और न ही मुद्दों के निर्धारण के समय इस पहलू पर कोई मुद्दा (issue) तैयार किया गया।

इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने यह माना कि क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार को लेकर प्रतिवादी द्वारा उठाई गई आपत्ति को त्याग दिया गया। अतः, न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया और वाद को उसके मूल क्रमांक पर पुनः स्थापित किया।

Case title: Hanuman Prasad Sharma @ H.P. Sharma v. J. Mithyleshwar

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