दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड के मामलों में, ठगी के पैसे लेने, उसे आगे भेजने या ठिकाने लगाने वाले लोगों की पहचान करना उतना ही ज़रूरी है, जितना कि पीड़ित से सीधे बातचीत करने वालों की पहचान करना।

जस्टिस संजीव नरूला ने यह बात 2.65 करोड़ रुपये के कथित डिजिटल-अरेस्ट फ्रॉड मामले में हिमांशु नाम के व्यक्ति की अग्रिम ज़मानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कही।

कोर्ट ने कहा कि इस तरह के फ्रॉड आमतौर पर सरकारी अधिकारियों का रूप धरकर, लगातार मानसिक दबाव डालकर और कई अकाउंट्स के ज़रिए तेज़ी से पैसे ट्रांसफर करके किए जाते हैं।

कोर्ट ने कहा कि इसलिए जांच में न केवल पीड़ित से सीधे बातचीत करने वाले लोगों की, बल्कि पैसे के लेन-देन में शामिल लोगों की भी जांच होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"डिजिटल-अरेस्ट फ्रॉड आमतौर पर सरकारी अधिकारियों का रूप धरकर, लगातार मानसिक दबाव डालकर और कई अकाउंट्स के ज़रिए तेज़ी से पैसे ट्रांसफर करके किए जाते हैं। इसलिए पैसे लेने, उसे आगे भेजने या ठिकाने लगाने वालों की पहचान करना उतना ही ज़रूरी हो सकता है, जितना कि पीड़ित से सीधे बातचीत करने वालों की पहचान करना।"

कोर्ट ने 'इन री: विक्टिम्स ऑफ़ डिजिटल अरेस्ट रिलेटेड टू फोर्ज़्ड डॉक्यूमेंट्स' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का ज़िक्र किया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल-अरेस्ट स्कैम के बड़े पैमाने और गंभीरता का संज्ञान लिया था। इसके लिए एक विशेष और समन्वित जांच की ज़रूरत बताई थी, जिसमें 'म्यूल' बैंक अकाउंट्स की जांच भी शामिल है।

यह मामला स्पेशल सेल द्वारा IPC की धाराओं 419, 420, 384 और 120B के तहत दर्ज FIR से जुड़ा है।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, एक सीनियर सिटिज़न से स्काइप और टेलीफ़ोन के ज़रिए संपर्क किया गया। संपर्क करने वालों ने TRAI, मुंबई पुलिस और CBI के अधिकारियों का रूप धरा था। आरोप है कि उन्हें गिरफ़्तारी की धमकी दी गई और कॉलर द्वारा बताए गए अकाउंट्स में 2.65 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया।

आरोपी हिमांशु पर शिकायतकर्ता से बात करने या धमकी देने वालों में शामिल होने का आरोप नहीं था। उसकी कथित संलिप्तता 'मनी ट्रेल' (पैसे के लेन-देन के रास्ते) से सामने आई।

पुलिस ने दावा किया कि वेवलैंड कॉमेस्टिबल प्राइवेट लिमिटेड के अकाउंट से 5.31 लाख रुपये ट्रांसफर किए गए। ...लिमिटेड से उसके कोटक महिंद्रा बैंक अकाउंट में जिसमें शिकायतकर्ता के 1.15 करोड़ रुपये पहले जमा किए गए।

याचिकाकर्ता (आरोपी) का दावा था कि विवादित रकम मोबाइल फोन की बिक्री से जुड़े असली कमर्शियल लेन-देन का पेमेंट थी। उसने इनवॉइस का हवाला दिया और कहा कि संबंधित सबूत दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक थे और जांच एजेंसी के पास पहले से ही मौजूद थे।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने कई सामान्य कमर्शियल रिकॉर्ड पेश नहीं किए, जिनमें GST और इनकम-टैक्स रिटर्न, स्टॉक या खरीद रजिस्टर, बिक्री रजिस्टर, लेजर, डिलीवरी चालान, ट्रांसपोर्ट रसीदें, पेमेंट रसीदें या ई-वे बिल शामिल हैं।

जस्टिस नरूला ने कहा कि याचिकाकर्ता लेन-देन से जुड़े कथित खरीदार का टेलीफोन नंबर या व्हाट्सएप बातचीत उपलब्ध कराने में असमर्थ है।

कोर्ट ने आरोपी के 5,31,168 रुपये जमा करने के प्रस्ताव को भी खारिज किया और कहा कि जांच केवल उस रकम की रिकवरी की प्रक्रिया नहीं है।

कोर्ट ने आगे कहा कि जांच एजेंसी को यह पता लगाना है कि पैसा उसके खाते में कैसे पहुंचा, क्या स्पष्टीकरण में जिस लेन-देन का हवाला दिया गया था वह असली था और उसके बाद फंड कहां गया।

इसके अनुसार, कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज की और कहा कि आरोपी BNSS की धारा 482 के तहत विवेक का इस्तेमाल करने के लिए कोई मामला नहीं बना पाया।

कोर्ट ने कहा,

"यह निष्कर्ष इस अतिरिक्त आपत्ति से स्वतंत्र है कि यह याचिका बार-बार दायर की गई और पिछली याचिका वापस लेने के बाद परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ।"

Case Title : HIMANSHU v. STATE GNCT OF DELHI

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