परिवार द्वारा प्रॉपर्टी का इस्तेमाल करने से बहन को भाई की प्रॉपर्टी पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता, जब तक कि सेल डीड को चुनौती न दी जाए: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि परिवार के सदस्यों द्वारा किसी प्रॉपर्टी का सिर्फ़ इस्तेमाल करने से उस पर मालिकाना हक नहीं मिल जाता, खासकर तब जब मालिकाना हक साबित करने वाली रजिस्टर्ड सेल डीड को चुनौती न दी गई हो।
एक महिला और उसके पति द्वारा दायर अपील खारिज करते हुए जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें महिला के भाई की प्रॉपर्टी खाली करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने पाया कि उनका वहां रहना सिर्फ़ अनुमति पर आधारित था और इससे उन्हें कोई कानूनी हक नहीं मिल जाता।
अपील करने वालों ने दलील दी थी कि विवादित प्रॉपर्टी संयुक्त परिवार के पैसों से खरीदी गई थी और यह संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा थी।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कि कुछ संपत्तियां पारिवारिक व्यवसाय के नाम पर हों या पारिवारिक व्यवसाय के पैसों से खरीदी गई हों, लेकिन यह ऐसी प्रॉपर्टी है, जो पूरी तरह से वादी (Plaintiff) की निजी संपत्ति है, जैसा कि सेल डीड से साफ़ ज़ाहिर होता है।
कोर्ट ने कहा,
"पार्टियों के माता-पिता अपने जीवनकाल में शायद उस जगह पर रहे हों। प्रतिवादी नंबर 1 (Defendant No.1) जो कि बहन है, वह भी शायद माता-पिता के जीवित रहते उस फ़्लैट में रहने आ गई हो और उनके बाद भी वहां रहती रही हो, लेकिन वे विवादित प्रॉपर्टी पर किसी भी तरह के मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकते।"
अपील करने वालों ने प्रॉपर्टी पर अपना कब्ज़ा बनाए रखने के हक का दावा करने के लिए एक कथित 'पारिवारिक समझौते' (Family Settlement) का भी सहारा लिया था।
हालांकि, कोर्ट ने पाया कि प्रॉपर्टी पूरी तरह से प्रतिवादियों (Respondents) के नाम पर थी, जिसके लिए 2009 में एक रजिस्टर्ड सेल डीड तैयार की गई, जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई। ऐसे हालात में कोर्ट ने फैसला सुनाया कि संयुक्त परिवार के पैसों से प्रॉपर्टी खरीदने या लंबे समय से वहां रहने के दावे, दस्तावेज़ी मालिकाना हक (Documentary Title) से ऊपर नहीं हो सकते।
कोर्ट ने आगे कहा,
"यह पारिवारिक समझौता, जिसके आधार पर अपील करने वाला प्रॉपर्टी पर अपने हक का दावा कर रहा है, पहले से ही 'बंटवारे के मुक़दमे' (Suit for Partition) का विषय है। अपील करने वाले उस मुक़दमे में ये सभी आधार उठाने के लिए स्वतंत्र हैं, ताकि वे पारिवारिक समझौते के आधार पर या इस आधार पर कि वादी/प्रतिवादी ने विवादित प्रॉपर्टी को 'संयुक्त संपत्ति' (Common Hotch-potch) में शामिल कर लिया था, अपने दावे को साबित कर सकें।"
इस तरह कोर्ट ने CPC के 'आदेश XII नियम 6' (स्वीकृति के आधार पर फ़ैसला/Judgment on admissions) के तहत पारित आदेश बरकरार रखा और अपील खारिज की।
Case title: Ms. Anju Chadha & Anr. v. Bhavesh Madan & Anr.