UPSC परीक्षाओं में उम्र में छूट के लिए SC/ST/OBC के बराबर अधिकार के हकदार नहीं EWS उम्मीदवार: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-17 05:19 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की, जिसमें केंद्र सरकार के तहत सीधी भर्तियों और नौकरियों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के उम्मीदवारों के लिए उम्र में छूट और अतिरिक्त मौकों की मांग की गई।

जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि EWS उम्मीदवारों को उम्र और मौकों में छूट न देने का केंद्र सरकार का नीतिगत फैसला न तो मनमाना है और न ही असंवैधानिक।

कोर्ट ने EWS श्रेणी के विभिन्न उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिकाओं के समूह को खारिज किया। उन्होंने DoPT के 31 जनवरी, 2019 के ऑफिस मेमोरेंडम, 2022 के FAQs और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा जारी सिविल सेवा परीक्षा, 2024 की अधिसूचना को चुनौती दी थी।

उन्होंने तर्क दिया कि संविधान (103वां संशोधन) अधिनियम, 2019 के बाद EWS उम्मीदवारों को 10% आरक्षण दिया गया, लेकिन SC/ST/OBC उम्मीदवारों के विपरीत उन्हें ऊपरी आयु सीमा या मौकों की संख्या में कोई संबंधित छूट नहीं दी गई। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह स्थिति भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता EWS श्रेणी के सदस्यों को उम्र में छूट देने या मौकों की संख्या बढ़ाने के लिए 'रिट ऑफ मैंडमस' जारी करने का कोई मामला बनाने में विफल रहे।

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह उन सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से अनजान नहीं है, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के तहत उम्मीदवारों के वर्गीकरण का आधार हैं।

कोर्ट ने कहा,

"इस श्रेणी में शामिल होने के लिए निर्धारित पात्रता मानदंड, जानबूझकर, सख्त और विशिष्ट रखे गए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि केवल वही लोग इसके दायरे में आएं, जो वास्तव में आर्थिक अभाव से पीड़ित हैं। साथ ही इस कोर्ट को उन संस्थागत सीमाओं के प्रति भी सचेत रहना चाहिए, जो न्यायिक समीक्षा के अधिकार क्षेत्र को सीमित करती हैं।"

कोर्ट ने आगे कहा,

“विधायिका ने EWS कैटेगरी के उम्मीदवारों की मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए आरक्षण लागू किया। हालांकि, याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई अतिरिक्त छूटों के लिए कई पहलुओं पर विचार करना ज़रूरी है। इनमें प्रशासनिक व्यावहारिकता और वित्तीय असर से लेकर मौजूदा आरक्षण व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर तक शामिल हैं। ऐसे फैसले निस्संदेह विधायी प्रकृति के होते हैं और विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।”

इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 342A, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई सूचियों को अलग-अलग मानता है। इसलिए अगर कोई समुदाय केंद्र सरकार की सूची में शामिल नहीं है, भले ही वह राज्य सरकार की सूची में शामिल हो तो वह केंद्र सरकार के अधीन सेवाओं में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा,

“अगर किसी खास जाति या समुदाय को केंद्र सरकार के उद्देश्यों के लिए OBC के तौर पर मान्यता नहीं मिली तो वह भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत केंद्र सरकार से मिलने वाली किसी भी अतिरिक्त छूट का दावा नहीं कर सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नीतियों और अलग-अलग राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अपनाई गई नीतियों के बीच समानता का कोई भी दावा सही नहीं माना जा सकता। बेंच ने कहा कि सेवा की शर्तें—जिनमें उम्र की सीमा तय करना और परीक्षा देने के मौकों की संख्या तय करना शामिल है—पूरी तरह से संबंधित भर्ती एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।

बेंच ने कहा,

“CSE नोटिफिकेशन, 2024, सिविल सेवा परीक्षा नियम, 2024 के अनुसार जारी किया गया। इन नियमों का नियम 3, अलग-अलग कैटेगरी के उम्मीदवारों को मिलने वाले परीक्षा के मौकों की संख्या तय करता है, जबकि नियम 5 में न्यूनतम और अधिकतम उम्र की सीमाएं तय की गईं। साथ ही कुछ खास कैटेगरी के उम्मीदवारों को उम्र में मिलने वाली छूट का भी ज़िक्र है। खास बात यह है कि इन नियमों में EWS कैटेगरी के उम्मीदवारों के लिए उम्र या परीक्षा के मौकों में किसी भी तरह की छूट का प्रावधान नहीं है। इन नियमों को इस कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई। वैसे भी, यह बात निर्विवाद है कि सरकार ने EWS उम्मीदवारों को ऐसी छूट देने वाली कोई नीति नहीं बनाई। इसलिए ऐसी किसी भी छूट का दावा अधिकार के तौर पर नहीं किया जा सकता।”

Title: ANISH ARUN & ORS v. UNION OF INDIA & ORS

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