DTC कंडक्टर को नौकरी से निकालना गलत: बिना कैश वेरिफ़िकेशन के टिकट दिए बिना किराया वसूलने का आरोप साबित नहीं होता - दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-06-16 13:22 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया डिवीज़न बेंच ने कहा कि ज़रूरी दस्तावेज़ (जैसे लॉग बुक और पिछला सर्विस रिकॉर्ड) न देने और पैसे के हेरफेर को साबित करने के लिए कैश वेरिफ़िकेशन न होने से अनुशासनात्मक जांच गलत हो जाती है। इसलिए कंडक्टर को नौकरी में वापस बहाल किया जाना चाहिए और उसकी सर्विस की निरंतरता (continuity of service) बनी रहनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

कर्मचारी जुलाई 1983 में दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (DTC) में डेली-रेटेड कंडक्टर के तौर पर शामिल हुआ। बाद में उसे मंथली-रेटेड सर्विस में डाल दिया गया। 24 अप्रैल 1992 को, जब वह ड्यूटी पर था, तो विजिलेंस चेकिंग स्क्वाड ने दस यात्रियों को बिना टिकट यात्रा करते हुए पाया।

पूछताछ करने पर यात्रियों ने बताया कि उन्होंने कंडक्टर को किराया दे दिया था। कंडक्टर के पास से बिना पंच किए टिकट बरामद हुए। इसलिए DTC ने कंडक्टर को चार्जशीट जारी की। अनुशासनात्मक जांच के बाद दुर्व्यवहार के आरोप साबित हुए। DTC ने उसे अक्टूबर 1994 से नौकरी से हटा दिया।

नौकरी से निकाले जाने से नाराज़ होकर कंडक्टर ने लेबर कोर्ट में इसे चुनौती दी। लेबर कोर्ट ने नौकरी से हटाने की सज़ा रद्द की और DTC को निर्देश दिया कि वह उसे सीनियरिटी, पेंशन और ग्रेच्युटी के मकसद से सर्विस की निरंतरता के साथ बहाल करे, लेकिन उसे पिछला वेतन (back wages) न दे। DTC ने लेबर कोर्ट के फ़ैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर करके चुनौती दी।

एक सिंगल जज ने DTC की याचिका खारिज की और लेबर कोर्ट का आदेश बरकरार रखा। इससे नाराज़ होकर DTC ने दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने अपील दायर की।

DTC ने तर्क दिया कि कंडक्टर कार्यवाही में शामिल हुआ और उसने गवाहों से जिरह (cross-examination) की थी। इसके अलावा, उसने किसी सह-कर्मी या लेबर कमिश्नर की मदद लेने से इनकार कर दिया था। यह भी तर्क दिया गया कि कंडक्टर का टिकट दिए बिना किराया वसूलने का इतिहास रहा है, जैसा कि उसके पिछले रिकॉर्ड से पता चलता है। इसलिए लेबर कोर्ट ने उसे पिछला वेतन देने से इनकार किया था। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि लेबर कोर्ट और सिंगल जज ने यह मानने में गलती की कि लॉग बुक, ड्राइवर मेमो और यात्रियों के बयान नहीं दिए गए, क्योंकि कंडक्टर ने खुद क्रॉस-एग्जामिनेशन में माना कि उसकी बस की जांच की गई और चालान काटा गया। इसलिए जांच की कार्यवाही के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।

दूसरी ओर, कंडक्टर ने तर्क दिया कि आरोप झूठे और मनगढ़ंत थे। स्क्वाड ने किसी भी सह-यात्री को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया। साथ ही यात्रियों के सही बयान भी दर्ज नहीं किए गए। कंडक्टर के पास मौजूद कैश की कभी जांच नहीं की गई। यह भी कहा गया कि आरोपों को साबित करने के लिए ज़रूरी गवाहों से पूछताछ नहीं की गई।

इसके अलावा, अनुशासनात्मक अधिकारी ने बिना सुनवाई का मौका दिए आदेश पारित किया। कंडक्टर ने तर्क दिया कि लॉग बुक, यात्रियों के बयान और उसके पिछले सर्विस रिकॉर्ड न तो उसे दिए गए और न ही चार्जशीट के साथ संलग्न किए गए।

यह भी तर्क दिया गया कि जांच अधिकारी ने उसे यह नहीं बताया कि वह बचाव सहायक के तौर पर किसी सह-कर्मी की मदद ले सकता है। दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम श्याम सिंह मामले के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि कंडक्टर के पास मौजूद कैश की जांच न होने पर आरोपों को साबित नहीं माना जा सकता।

अदालत के निष्कर्ष और टिप्पणियां

डिविजन बेंच ने पाया कि स्क्वाड ने बस को रोका और पाया कि दस यात्री बिना टिकट यात्रा कर रहे थे। हालांकि, ऐसी जांच के समय कंडक्टर के पास मौजूद कैश की कोई पुष्टि नहीं की गई। यह भी पाया गया कि यात्रियों के बयान अधूरे थे और उनमें महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं। बयानों में यात्रा शुरू होने की सटीक जगह, गंतव्य या भुगतान किए गए किराए का खुलासा नहीं किया गया। इसलिए DTC विश्वसनीय और सुसंगत सबूतों से 'दुर्व्यवहार' के आरोप को साबित करने की अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाई।

दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम श्याम सिंह मामले के फैसले का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि स्क्वाड जांच के समय कंडक्टर के पास मिले कैश की पुष्टि करने में विफल रहा था। इसलिए ऐसे कैश की पुष्टि न होने पर सबूतों के आधार पर किराए के गबन के आरोप को निर्णायक रूप से साबित नहीं माना जा सकता।

यह भी देखा गया कि कंडक्टर को लॉग बुक (जो उसके बचाव का हिस्सा थी) नहीं दी गई, क्योंकि जांच अधिकारी ने इसे गैर-ज़रूरी माना। दूसरा, यात्रियों के बयान कंडक्टर को नहीं दिए गए, उसे सिर्फ़ उन्हें देखने की इजाज़त दी गई। तीसरा, कंडक्टर को बचाव में मदद करने वाले सहायक (डिफेंस असिस्टेंट) की उपलब्धता के बारे में नहीं बताया गया। चौथा, चार्जशीट में ही कहा गया कि अंतिम आदेश देते समय प्रतिवादी के पिछले सर्विस रिकॉर्ड पर विचार किया जाएगा, फिर भी पिछला रिकॉर्ड उसमें शामिल नहीं किया गया और कंडक्टर को उस पर सफाई देने या उसका खंडन करने का कोई मौका नहीं दिया गया। इसलिए यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

यह माना गया कि सिंगल जज ने लेबर कोर्ट के निष्कर्षों को सही ठहराया। लेबर कोर्ट ने पाया था कि जांच की प्रक्रिया में खामियां थीं। यह भी पाया गया कि DTC ठोस और विश्वसनीय सबूतों के ज़रिए 'दुर्व्यवहार' (misconduct) के आरोप को साबित करने में नाकाम रही, क्योंकि कंडक्टर के पास मौजूद कैश की जांच नहीं की गई, यात्रियों के बयानों में विसंगतियां थीं, और जांच के दौरान ज़रूरी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं कराए गए।

डिविजन बेंच ने माना कि सर्विस की निरंतरता के साथ बहाली का आदेश सही था। साथ ही कंडक्टर के पिछले असंतोषजनक रिकॉर्ड के कारण पिछली बकाया सैलरी (बैक वेजेज़) न देने के फैसले को भी सही माना गया।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए डिविजन बेंच ने सिंगल जज का आदेश बरकरार रखा। नतीजतन, DTC द्वारा दायर अपील को डिविजन बेंच ने खारिज किया।

Case Name : Delhi Transport Corporation vs Ram Avtar Sharma

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