तलाक की कार्यवाही से जुड़ी अपील दिल्ली सरकार के खिलाफ नहीं हो सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तलाक की कार्यवाही में पारित आदेश को चुनौती देने वाली अपील दिल्ली सरकार के खिलाफ कायम नहीं की जा सकती, खासकर तब जब विवाद पति-पत्नी के बीच हो और पति को ही अपील में पक्षकार न बनाया गया हो।
चीफ जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने पत्नी की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि तलाक की कार्यवाही में पति के कथित आचरण और उसके खिलाफ लगाए गए आरोप ही विवाद का विषय हैं, ऐसे में अपील में पति को पक्षकार बनाए बिना दिल्ली सरकार को प्रतिवादी बनाना उचित नहीं है।
अदालत ने कहा,
“हम यह समझने में असमर्थ हैं कि पत्नी और पति के बीच तलाक की कार्यवाही में पारित आदेश को चुनौती देने वाली मौजूदा अपील दिल्ली सरकार के खिलाफ कैसे कायम रखी जा सकती है, खासकर जब पति को ही इस अपील में पक्षकार नहीं बनाया गया है।”
मामला फैमिली कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें पत्नी की तलाक याचिका को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के अभाव में वापस कर दिया गया। फैमिली कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CrPC) के आदेश सात नियम 10 के तहत याचिका को उचित अदालत में पेश करने के लिए लौटाया था।
पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने माना था कि दिल्ली में याचिका पर सुनवाई का क्षेत्रीय अधिकार नहीं बनता।
दोनों की शादी 18 जनवरी 2019 को गुरुग्राम में हुई। शादी के बाद पति-पत्नी करीब डेढ़ से दो साल तक दिल्ली के संगम विहार स्थित पति के वैवाहिक घर में साथ रहे। इसके बाद पति की नौकरी गुरुग्राम में होने के कारण दोनों वहां किराये के मकान में रहने लगे और चार साल से अधिक समय तक साथ रहे।
पत्नी ने आरोप लगाया कि शादी के दौरान उसे क्रूरता का सामना करना पड़ा। उसने पति पर शराब का आदी होने का भी आरोप लगाया। पत्नी के अनुसार, तलाक की याचिका दाखिल करने से करीब दो सप्ताह पहले उसे वैवाहिक घर से निकाल दिया गया। इसके बाद वह बच्चों के साथ अपने मायके के पास अलग रहने लगी।
फैमिली कोर्ट ने पाया कि हालांकि पति-पत्नी पहले संगम विहार में साथ रहे थे, लेकिन उनका अंतिम साझा निवास गुरुग्राम में था। इसलिए दिल्ली में उनका पुराना निवास हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) के तहत दिल्ली की अदालत को क्षेत्रीय अधिकार देने के लिए पर्याप्त नहीं था।
हाईकोर्ट में पत्नी की ओर से दलील दी गई कि संगम विहार में डेढ़ से दो साल तक साथ रहना ही दिल्ली की फैमिली कोर्ट को मामले की सुनवाई का अधिकार देने के लिए पर्याप्त है। उनका कहना था कि धारा 19(iii) में यह जरूरी नहीं है कि पति-पत्नी का साझा निवास सबसे हाल का निवास ही हो।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19(iii) स्पष्ट रूप से उस अदालत को क्षेत्रीय अधिकार देती है, जिसकी सीमा में “विवाह के पक्षकार अंतिम बार साथ रहे हों।
खंडपीठ ने कहा कि केवल संगम विहार में पहले साथ रहने के आधार पर दिल्ली की परिवार अदालत को क्षेत्रीय अधिकार नहीं मिल सकता, क्योंकि इसके बाद दोनों गुरुग्राम चले गए थे और वहीं उनका अंतिम साझा निवास था।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पति-पत्नी संगम विहार में करीब डेढ़ से दो साल रहे, जबकि इसके बाद गुरुग्राम में चार साल से अधिक समय तक साथ रहे। इसलिए कानून में इस्तेमाल किया गया अंतिम बार साथ रहे का अर्थ उस अंतिम स्थान से है, जहां दोनों ने पति-पत्नी के रूप में साथ निवास किया।
खंडपीठ ने कहा कि धारा 19(iii) के तहत अंतिम साझा निवास ही क्षेत्रीय अधिकार तय करने का निर्णायक आधार है।
अदालत ने पत्नी की अपील को पक्षकारों की दृष्टि से सुनवाई योग्य न होने और मामले के गुण-दोष, दोनों आधारों पर खारिज किया।