S.413 BNSS| बरी होने या कम गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के खिलाफ पीड़ित को अपील के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी अपराध का पीड़ित व्यक्ति आरोपी के बरी होने या कम गंभीर अपराध में दोषसिद्ध किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील दायर कर सकता है और इसके लिए उसे अपील की अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ित को मिला यह अपील का अधिकार भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 413 के प्रावधान के तहत स्वतंत्र अधिकार है। राज्य या ऐसे शिकायतकर्ता के लिए स्थिति अलग है जो स्वयं पीड़ित नहीं है और बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देना चाहता है।
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 372 के प्रावधान और BNSS की धारा 413 के संबंधित प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की। अदालत ने याचिकाकर्ता की उस वैकल्पिक मांग को भी ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया कि यह प्रावधान केवल निजी शिकायत से शुरू हुए मामलों में लागू होना चाहिए पुलिस द्वारा दर्ज मामलों में नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया। प्रावधान आरोपी को बरी करने, कम गंभीर अपराध में दोषसिद्ध करने या अपर्याप्त मुआवजा देने वाले आदेश के खिलाफ पीड़ित को अपील का अधिकार देता है। इसे केवल निजी शिकायत के मामलों तक सीमित मानना ऐसा शब्द कानून में जोड़ने के समान होगा, जिसे विधायिका ने वहां रखा ही नहीं है।
मामला एक व्यक्ति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 509 के तहत दर्ज FIR से जुड़ा था। मुकदमे की सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट अदालत ने 16 अक्टूबर 2024 को आरोपी को बरी कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता और पीड़ित ने बरी किए जाने के आदेश को सत्र अदालत में चुनौती देते हुए अपील दायर की।
आरोपी ने इस अपील की सुनवाई योग्य होने पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उसका कहना था कि चूंकि संबंधित अपराध संज्ञेय और जमानती था इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील केवल हाईकोर्ट में दायर की जा सकती है। इसके लिए धारा 378 के तहत अपील की अनुमति लेना जरूरी है। हालांकि, सेशन कोर्ट ने उसकी आपत्ति खारिज कर दी। इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख किया और सत्र अदालत के आदेश के साथ-साथ पीड़ित को मिले अपील के वैधानिक अधिकार की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि धारा 378 में बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था दी गई और राज्य को भी अपील दायर करने से पहले अनुमति लेनी पड़ती है। उसके अनुसार धारा 372 के प्रावधान के कारण पीड़ित और राज्य के बीच भेद पैदा हो रहा है। उसका कहना था कि यदि संज्ञेय और जमानती अपराध में मजिस्ट्रेट किसी आरोपी को बरी करता है तो राज्य को धारा 378 के तहत अपील करनी होती है और इसके लिए अनुमति लेने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जबकि पीड़ित सीधे धारा 372 के प्रावधान के तहत अपील कर सकता है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह गलत बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मान लेना भी गलत है कि आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देने के लिए पीड़ित को भी राज्य की तरह अपील की अनुमति लेने की बाध्यता होनी चाहिए।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 'सेलेस्टियम फाइनेंशियल' फैसले का हवाला देते हुए कहा कि बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देने के मामले में राज्य, शिकायतकर्ता और पीड़ित के अधिकारों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया। यदि कोई शिकायतकर्ता स्वयं पीड़ित नहीं है और निजी शिकायत के मामले में आरोपी के बरी होने को चुनौती देता है तो धारा 378(4) के तहत विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता बनी रहती है। लेकिन यदि शिकायतकर्ता स्वयं उस अपराध का पीड़ित भी है तो वह धारा 372 के प्रावधान के तहत पीड़ित के रूप में अपील का स्वतंत्र अधिकार इस्तेमाल कर सकता है और उसे विशेष अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के 'खेम सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य' फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया कि धारा 372 में प्रावधान जोड़ने का उद्देश्य पीड़ित को स्वतंत्र अपील का अधिकार देना था और यह अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं करता कि पीड़ित व्यक्ति उसी मामले में शिकायतकर्ता भी है या नहीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन फैसलों के मद्देनजर धारा 372 के प्रावधान और BNSS की धारा 413 के संबंधित प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने में कोई दम नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि सत्र अदालत के 6 अप्रैल 2026 के आदेश में कोई अवैधता या अनियमितता नहीं थी, जिसके तहत आरोपी की ओर से पीड़ित द्वारा दायर अपील की सुनवाई योग्य होने पर उठाई गई प्रारंभिक आपत्ति खारिज कर दी गई।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।