दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO Act के तहत दर्ज यौन अपराध को पीड़ित बच्चे या उसके परिवार और आरोपी के बीच हुए समझौते के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने एक 49 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ दर्ज FIR और उसके आधार पर चल रही कार्रवाई रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज की।

जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ के समक्ष यह मामला आया था।

आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 और 506 तथा लैंगिक अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 6 के तहत मामला दर्ज किया गया।

आरोपी ने हाईकोर्ट से FIR और उसके बाद की कार्रवाई रद्द करने की मांग की। इसके लिए उसने पीड़िता और उसके परिवार की मध्यस्थता से हुए कथित समझौते का हवाला दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में एक बच्चे के साथ भरोसे या अधिकार की स्थिति में मौजूद व्यक्ति द्वारा गंभीर प्रकृति का यौन हमला करने के आरोप हैं। अदालत ने माना कि इस तरह के अपराध न केवल गंभीर हैं बल्कि समाज पर भी व्यापक प्रभाव डालते हैं।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जियान सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया। इसमें कहा गया कि हाईकोर्ट अपने अंतर्निहित अधिकारों का इस्तेमाल कुछ उपयुक्त मामलों में समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही खत्म करने के लिए कर सकता है लेकिन गंभीर और जघन्य अपराधों, मानसिक विकृति से जुड़े अपराधों तथा यौन अपराधों में इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में पीड़ित और आरोपी के बीच हुआ समझौता कानूनी मान्यता नहीं रखता।

अदालत ने कहा,

“POCSO Act के तहत अपराध में बच्चा पीड़ित या उसका परिवार समझौता नहीं कर सकता।”

अदालत ने यह भी कहा कि इस चरण पर केवल समझौते के आधार पर कार्यवाही खत्म करना कानून के उद्देश्य और न्याय के हित, दोनों को प्रभावित करेगा।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज की। हालांकि अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश को मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं माना जाएगा। मुकदमे का फैसला ट्रायल कोर्ट में पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।

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