सत्या निकेतन PG हादसा: मालिकों ने स्ट्रक्चरल इंजीनियर की सलाह नहीं ली, बिना अनुमति कराए निर्माण-परिवर्तन- दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया
दिल्ली के सत्या निकेतन इलाके में इस महीने हुए PG हादसे में 7 लोगों की मौत के मामले में दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया है कि मकान मालिकों ने संरचनात्मक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की थी। पुलिस के अनुसार, मरम्मत और स्ट्रक्चरल बदलाव से पहले किसी योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर या आर्किटेक्ट की सलाह भी नहीं ली गई।
पुलिस ने यह जानकारी कानून के छात्र अनिकेत कुमार गुप्ता की ओर से दायर जनहित याचिका के जवाब में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में दी है। याचिका में हादसे से प्रभावित छात्रों के इलाज और पुनर्वास, पीड़ितों को मुआवजा, असुरक्षित परिसरों से छात्रों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने और महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग की गई है।
बिना अनुमति किए गए थे स्ट्रक्चरल बदलाव
पुलिस के मुताबिक, जांच में सामने आया कि मकान में सक्षम अधिकारियों से जरूरी अनुमति लिए बिना निर्माण और संरचनात्मक बदलाव किए गए थे। मकान का व्यावसायिक इस्तेमाल किए जाने के बावजूद लैंड-यूज कन्वर्जन की अनुमति भी नहीं ली गई थी।
प्रारंभिक निरीक्षण में पाया गया कि पुराने मकान के बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों में बिना अनुमति अतिरिक्त निर्माण और संरचनात्मक बदलाव किए गए। पुलिस के अनुसार, इन बदलावों से मौजूदा ढांचे पर अतिरिक्त भार पड़ा और उसकी लोड-बेयरिंग क्षमता प्रभावित हुई।
हालांकि, पुलिस ने स्पष्ट किया कि मकान गिरने का सटीक संरचनात्मक कारण अभी निर्धारित नहीं हुआ है और इसके लिए विस्तृत जांच तथा विशेषज्ञों की जांच जारी है।
हादसे से 10-12 दिन पहले शुरू हुआ था काम
पुलिस ने बताया कि घटना से करीब 10-12 दिन पहले आरोपी उर्मिला गुप्ता, उनके पति हरि राम गुप्ता और बेटे महेश गुप्ता ने संयुक्त रूप से भवन में निर्माण, स्ट्रक्चरल बदलाव, संशोधन और मरम्मत का काम शुरू कराया था।
जांच के अनुसार, महेश गुप्ता और उनके माता-पिता ने काम के लिए एक अप्रशिक्षित और अयोग्य ठेकेदार को लगाया था। पुलिस का आरोप है कि मकान मालिकों ने किसी योग्य स्ट्रक्चरल इंजीनियर, आर्किटेक्ट या अन्य सक्षम विशेषज्ञ की सलाह नहीं ली।
12 लोग मलबे से निकाले गए
पुलिस के अनुसार, हादसे के बाद 12 लोगों को मलबे से बचाया गया। इनमें से सात लोगों—पांच छात्रों और दो मजदूरों—को मृत घोषित किया गया, जबकि अन्य लोग घायल हुए।
पुलिस ने यह भी बताया कि PG संचालकों ने भवन को किराए पर लेते समय उसकी संरचनात्मक सुरक्षा या डिजाइन का उचित सत्यापन नहीं किया था। उन्होंने PG में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त उपाय भी नहीं किए और निर्माण कार्य से पैदा होने वाले संभावित खतरे के बारे में उन्हें चेतावनी नहीं दी।
पुलिस के मुताबिक, हादसे के तुरंत बाद आरोपियों ने मौके पर रुककर जिम्मेदारी निभाने और राहत कार्य में मदद करने के बजाय वहां से चले जाने का प्रयास किया। जांच में उनकी व्यक्तिगत भूमिका की भी जांच की जा रही है।
दस्तावेज और वैज्ञानिक साक्ष्य जुटा रही पुलिस
पुलिस ने हाईकोर्ट को बताया कि जांच एजेंसी मकान के स्वामित्व, बिजली-पानी कनेक्शन, निर्माण और मरम्मत कार्य, किरायेदारी एवं रेंट एग्रीमेंट, संबंधित अनुमतियों, मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजी एवं वैज्ञानिक साक्ष्य जुटा रही है।
पुलिस ने कहा कि आगे की कार्रवाई जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों और सक्षम विशेषज्ञों की राय के आधार पर की जाएगी।
स्वतंत्र समिति और PGs के सेफ्टी ऑडिट की मांग
याचिकाकर्ता ने मकान गिरने के सटीक कारण और जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र न्यायिक या तकनीकी समिति गठित करने की मांग की है। इसके अलावा दिल्ली में PG, हॉस्टल और छात्रों के अन्य आवासीय परिसरों का व्यापक स्ट्रक्चरल और सेफ्टी ऑडिट कराने की भी मांग की गई है।
मामले की सुनवाई कल चीफ़ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष होगी।
हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई में अधिकारियों को हादसे से प्रभावित छात्रों की जान बचाने के लिए प्रयास दोगुने करने को कहा था। कोर्ट ने MCD को इस मामले को उच्चतम कार्यकारी स्तर पर उठाने और यह जांच करने का निर्देश दिया था कि गिरे हुए मकान वैध अनुमति के तहत बनाए गए थे या नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा था कि यदि निर्माण वैध अनुमति के बिना हुआ पाया जाता है तो MCD को लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों या कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करनी होगी।