यूथ ओलंपिक में घुड़सवारी चयन पर दिल्ली हाईकोर्ट की मुहर, भविष्य के लिए स्पष्ट मानदंड और समयसीमा तय करने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2026 यूथ ओलंपिक खेलों में शो जंपिंग के लिए भारतीय घुड़सवार के चयन को चुनौती देने वाली अपीलें खारिज की। हालांकि, हाईकोर्ट ने भारतीय घुड़सवारी महासंघ को भविष्य में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए चयन के मानदंड और समयसीमा स्पष्ट एवं सटीक तरीके से तय करने का निर्देश दिया है, ताकि खिलाड़ियों के बीच अनावश्यक विवाद की स्थिति पैदा न हो।
चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी के लिए शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक और भावनात्मक मजबूती भी जरूरी होती है। ऐसे में चयन प्रक्रिया में ऐसी अस्पष्टता नहीं होनी चाहिए, जिससे खिलाड़ियों की तैयारी प्रभावित हो।
खंडपीठ ने कहा,
“किसी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी के लिए केवल शारीरिक क्षमता ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक मजबूती भी जरूरी है।”
अदालत ने कहा कि चयन के मानदंड और समयसीमा को पर्याप्त स्पष्टता के साथ तैयार, खिलाड़ियों तक पहुंचाया और लागू किया जाना चाहिए।
यह मामला शुभ चौधरी की उस अपील से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने चयन निर्णय-द्वितीय को चुनौती दी थी। इस निर्णय में श्रेष्ठ राजू मंटेना को पहले स्थान पर रखा गया था। चौधरी का तर्क था कि घुड़सवारों की रैंकिंग क्वालीफाइंग प्रदर्शन की संख्या के बजाय औसत पेनल्टी अंकों के आधार पर की जानी चाहिए थी।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि चयन प्रक्रिया में 'निरंतरता' को केवल कुछ चुने हुए परिणामों के गणितीय औसत तक सीमित नहीं किया जा सकता। सीमित संख्या में प्रतियोगिताओं के परिणामों का औसत उस खिलाड़ी को अनुचित लाभ दे सकता है, जो कम प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि चयन निर्णय की वैधता का आकलन उन कारणों के आधार पर किया जाना चाहिए, जो निर्णय लेते समय दर्ज किए गए, न कि बाद में बताए गए कारणों के आधार पर।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि चौधरी ने अपने पिता के माध्यम से पुनर्गठित चयन समिति की कार्यवाही में हिस्सा लिया था और उस समय समिति के गठन पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि पुनर्विचार की प्रक्रिया में हिस्सा लेने के बाद केवल परिणाम अपने पक्ष में नहीं आने के कारण चयन समिति की संरचना पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
खंडपीठ ने कहा कि चयन निर्णय-द्वितीय में अपनाई गई प्रक्रिया घोषित चयन मानदंड से तार्किक रूप से जुड़ी हुई थी, सभी सात क्वालीफाइंग प्रदर्शन वाले घुड़सवारों पर समान रूप से लागू की गई और निर्णय के समय उसके कारण दर्ज किए गए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी माना कि चयन मानदंड में मूल्यांकन की अवधि और क्वालीफाइंग सीमा को पर्याप्त स्पष्टता से तय नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि इसी अस्पष्टता के कारण दोनों पक्षों के बीच बार-बार मुकदमेबाजी की स्थिति बनी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कमी के बावजूद चयन प्रक्रिया में ऐसी कोई खामी साबित नहीं हुई, जिसके आधार पर अदालत को चयन में हस्तक्षेप करना जरूरी हो।
खंडपीठ ने यह भी दोहराया कि अदालतें विशेषज्ञ चयन समितियों द्वारा खिलाड़ियों की तुलनात्मक खेल क्षमता के आकलन पर अपील की अदालत की तरह विचार नहीं कर सकतीं और चयनकर्ताओं के आकलन की जगह अपना आकलन नहीं रख सकतीं।
इस आधार पर खंडपीठ ने 17 सितंबर 2026 के सिंगल जज का फैसला सही ठहराते हुए शुभ चौधरी की अपील खारिज की। एक अन्य खिलाड़ी वास्वी खैतान की अपील भी इसी तरह खारिज की गई। खैतान ने भी यूथ ओलंपिक 2026 के लिए श्रेष्ठ राजू मंटेना के चयन में हस्तक्षेप से इनकार करने वाले सिंगल जज के फैसले को चुनौती दी थी।
वास्वी खैतान की अपील पर हाईकोर्ट ने कहा कि भविष्य में भारतीय घुड़सवारी महासंघ की चयन प्रक्रिया में अधिक स्पष्टता, पारदर्शिता और निरंतरता की जरूरत पर सिंगल जज द्वारा की गई टिप्पणियां पूरी तरह आवश्यक थीं।