Delhi Riots: हाईकोर्ट ने गैर-इरादतन हत्या के दोषी पांच लोगों की 7 साल की जेल की सजा बरकरार रखी
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान 22 वर्षीय युवक की हत्या के मामले में पांच लोगों को 'गैर-इरादतन हत्या' (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) के लिए सुनाई गई सजा और 7 साल की जेल बरकरार रखी।
जस्टिस मधु जैन ने अमन कश्यप, देवेंद्र कुमार, प्रदीप राय, आशीष और अरुण कुमार की उन अपीलों को खारिज किया, जिनमें उन्होंने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 148 और 304 (भाग 1) के साथ धारा 149 के तहत अपनी दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।
कोर्ट ने कहा कि सबूतों से यह साबित होता है कि आरोपी न केवल भीड़ में मौजूद थे, बल्कि वे हथियारों से लैस उस भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे और दूसरों को मृतक पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे।
कोर्ट ने कहा,
"मृतक का पीछा किया गया, उसे घेरा गया और पुलिस बैरिकेड्स के पास गिर जाने के बाद भी उस पर हमला किया गया। आरोपियों का बर्ताव, भीड़ के पास मौजूद हथियार और मृतक पर लगातार किया गया हमला, इस बात का ठोस आधार है कि इस भीड़ का एक गैर-कानूनी और साझा मकसद मृतक पर हमला करना और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाना था।"
कोर्ट ने आगे कहा कि एक बार जब यह साबित हो जाता है कि कोई व्यक्ति किसी गैर-कानूनी भीड़ का हिस्सा था और उसका साझा मकसद या जानकारी थी, तो भले ही यह साबित न हो पाए कि किस व्यक्ति ने जानलेवा चोट पहुंचाई, फिर भी आरोपी IPC की धारा 149 के तहत अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
यह मामला 25 फरवरी 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान की घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, चांद बाग इलाके में पीर बाबा मजार के पास एक भीड़ ने मोनिश का पीछा किया और उस पर हमला किया। उसे गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाया गया, जहां चोटों के कारण उसकी मौत हो गई।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, उसकी मौत किसी भारी वस्तु की चोट से दिमाग में आई गंभीर चोटों (एंटी-मॉर्टम ब्रेन इंजरी) के कारण लगे शॉक (सदमे) से हुई। ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर 2024 के अपने फैसले में पांचों अपीलकर्ताओं को IPC की धारा 148 और धारा 304 (भाग I) के साथ धारा 149 के तहत दोषी ठहराया। 13 जनवरी 2025 को, उन्हें घातक हथियारों के साथ दंगा करने के लिए एक साल की साधारण कैद, और हत्या की श्रेणी में न आने वाले गैर-इरादतन मानव वध (Culpable Homicide not Amounting to Murder) के लिए सात साल की कठोर कैद तथा 30,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। इन सभी सजाओं को एक साथ (Concurrently) काटने का निर्देश दिया गया।
अपीलकर्ताओं ने अपनी दोषसिद्धि को कई आधारों पर चुनौती दी, जिनमें चश्मदीदों के बयानों में विरोधाभास, पुलिस गवाहों के बयान दर्ज करने में देरी, टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) न होना और जांच में कथित कमियां शामिल थीं।
इन तर्कों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि उस इलाके में तैनात एक बीट कांस्टेबल ने पांचों अपीलकर्ताओं की पहचान की थी और बताया कि वह अपनी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान घटना से पहले से ही उन्हें जानता था।
कोर्ट ने पाया कि हेड कांस्टेबल और एक अन्य कांस्टेबल ने मृतक का पीछा करने, उस पर हमला करने और बाद में पुलिसकर्मियों द्वारा बीच-बचाव किए जाने के घटनाक्रम की पुष्टि की।
कोर्ट ने आगे कहा कि पुलिस अधिकारियों की गवाही को केवल उनके आधिकारिक पद के कारण खारिज नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके बयानों का मूल्यांकन उनके अपने गुणों (Merits) के आधार पर किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"इस मामले में पुलिस पिकेट पर उक्त गवाहों की मौजूदगी ड्यूटी रिकॉर्ड से साबित होती है। मृतक का पीछा करने, उस पर हमला करने और बाद में उसे बचाए जाने के तरीके के बारे में उनके बयान काफी हद तक मेल खाते हैं। इसलिए उनका आधिकारिक पद अपने आप में कोई अलग आधार नहीं बन सकता।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि भीड़ के पास मौजूद हथियारों की प्रकृति, अपीलकर्ताओं द्वारा उकसाने वाले बयानों और मृतक पर हमला करने के तरीके को एक साथ रखकर देखा जाना चाहिए, ताकि उनके इरादे और 'कंस्ट्रक्टिव लायबिलिटी' (Constructive Liability) के लागू होने का निर्धारण किया जा सके।
इसके अनुसार, कोर्ट ने पांचों अपीलें खारिज कीं और ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि के फैसले तथा सजा का आदेश बरकरार रखा।
Case Title : Aman Kashyap v. State of NCT of Delhi & Connected Matters