दिल्ली हाईकोर्ट ने 33 साल पुराने नकली पासपोर्ट वेरिफिकेशन मामले में पूर्व पुलिसकर्मी की सज़ा बरकरार रखी

Update: 2026-05-07 05:01 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस के पूर्व असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) की सज़ा बरकरार रखी। यह मामला 33 साल पुराना है और इसमें नकली दस्तावेज़ों और झूठी पुलिस रिपोर्टों का इस्तेमाल करके पासपोर्ट हासिल करने की कोशिश की गई।

जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने पूर्व ASI सूबे सिंह की अपील खारिज की, जिसमें उन्होंने IPC की धारा 120-B और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) (सपठित धारा 13(2)) के तहत अपनी सज़ा को चुनौती दी थी।

अभियोजन पक्ष का यह मामला 1993 का है, जब चार आरोपियों ने कथित तौर पर नकली दस्तावेज़ों और झूठे पतों का इस्तेमाल करके पासपोर्ट हासिल करने के लिए एक आपराधिक साज़िश रची थी।

CBI के अनुसार, दो आरोपियों ने पासपोर्ट के लिए ऐसे आवेदन जमा किए, जिनमें काल्पनिक पते लिखे थे, जबकि दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच में तैनात सूबे सिंह को इन पतों का पुलिस वेरिफिकेशन करने का काम सौंपा गया।

सूबे सिंह पर आरोप था कि उन्होंने जान-बूझकर झूठी वेरिफिकेशन रिपोर्ट जमा की, जिसमें उन्होंने पतों और अन्य जानकारियों को सही बताया। ऐसा करके उन्होंने नकली राशन कार्डों और मनगढ़ंत रिकॉर्डों के आधार पर पासपोर्ट जारी करवाने में मदद की थी।

इस मामले में 1995 में CBI ने FIR दर्ज की थी, जिसमें IPC, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और पासपोर्ट अधिनियम के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया। सुनवाई पूरी होने के बाद, 2006 में स्पेशल जज (CBI) ने सूबे सिंह को दोषी ठहराया और IPC तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत उन्हें जेल की सज़ा सुनाई।

हाईकोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने यह दलील दी कि CrPC की धारा 313 के तहत उन पर लगे आरोपों और परिस्थितियों को ठीक से उनके सामने पेश नहीं किया गया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि रिपोर्ट जमा करने से पहले उन्होंने खुद जाकर उन पतों का वेरिफिकेशन किया। इसके अलावा, उन्होंने यह भी तर्क दिया कि CrPC की धारा 197 के तहत अभियोजन की मंज़ूरी (Sanction) ली जानी चाहिए थी।

अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने वहां के निवासियों और एक डाकिया की गवाहियों पर भरोसा किया। इन गवाहों ने बताया था कि पासपोर्ट आवेदनों में जिस नाम का ज़िक्र था, उस नाम का कोई भी व्यक्ति उन पतों पर कभी रहा ही नहीं था, और न ही वहां किसी तरह का कोई पुलिस वेरिफिकेशन किया गया।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा,

"यह साफ ज़ाहिर है कि आरोपी नंबर 1 (सूबे सिंह) ने एक झूठी रिपोर्ट दी थी, जिसके आधार पर पासपोर्ट जारी किया गया था। इसलिए, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d)(ii) के तहत किया गया अपराध स्पष्ट रूप से साबित होता है।"

आपराधिक साज़िश के अपराध पर आते हुए अदालत ने कहा कि आपराधिक साज़िश के मामले को साबित करने के लिए सीधे सबूत देना शायद ही कभी संभव होता है।

मौजूदा मामले में किसी भी आपराधिक साज़िश का कोई सीधा सबूत नहीं था।

हालाँकि, अदालत ने माना,

"साज़िश का अंदाज़ा परिस्थितियों से भी लगाया जा सकता है।"

चूंकि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह पूरी तरह साबित हो गया कि पूर्व ASI ने आरोपियों में से एक को गलत जानकारी का इस्तेमाल करके पासपोर्ट बनवाने में मदद की थी, इसलिए अदालत ने अपील खारिज की।

Case title: Sube Singh v. CBI

Tags:    

Similar News