सिर्फ मुंबई ऑफिस का पता लिख देने से नहीं बदलेगा कोर्ट का अधिकार क्षेत्र, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- जहां विवाद का हिस्सा पैदा हुआ, वहीं चलेगा मुकदमा

Update: 2026-05-22 06:31 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल चालान (Invoices) और एयरवे बिल पर मुंबई स्थित प्रशासनिक कार्यालय का पता दर्ज होने मात्र से दिल्ली की अदालतों का क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं हो जाता, खासकर तब जब प्रतिवादी कंपनी का पंजीकृत कार्यालय दिल्ली में स्थित हो और विवाद से जुड़ा कुछ कारण दिल्ली में उत्पन्न हुआ हो।

जस्टिस मनोज कुमार ओहरी ने यह फैसला GAC लॉजिस्टिक्स द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए सुनाया। कंपनी ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें क्षेत्राधिकार के अभाव का हवाला देते हुए उसकी वसूली संबंधी वाद-पत्र (plaint) वापस कर दी गई थी।

मामला एक रिकवरी सूट से जुड़ा था, जिसमें फ्रेट फॉरवर्डिंग कंपनी GAC लॉजिस्टिक्स ने Acer Logistics के खिलाफ विदेशी कंसाइनमेंट्स की शिपमेंट और फॉरवर्डिंग सेवाओं के एवज में बकाया 14 लाख रुपये से अधिक की राशि की वसूली की मांग की थी।

ट्रायल कोर्ट ने Order VII Rule 10 CPC के तहत यह कहते हुए वाद-पत्र लौटा दिया था कि विवाद का कारण मुंबई से संबंधित है। हालांकि हाईकोर्ट में अपीलकर्ता कंपनी ने दलील दी कि मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य दिल्ली से जुड़े हैं। कंपनी ने कहा कि कंसाइनमेंट्स उसकी दिल्ली स्थित ऑफिस में सौंपे गए, भुगतान और पोस्ट-डेटेड चेक दिल्ली में प्राप्त और प्रस्तुत किए गए, तथा लेन-देन से जुड़े खाते भी दिल्ली में ही रखे गए।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 20(c) के तहत यदि कारण-ए-वाद (cause of action) का कोई भी हिस्सा किसी क्षेत्र में उत्पन्न होता है, तो वहां की अदालत को मामले की सुनवाई का अधिकार प्राप्त होता है।

अदालत ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादी कंपनी का पंजीकृत कार्यालय पंजाबी बाग, नई दिल्ली में स्थित है, जबकि मुंबई का पता केवल प्रशासनिक कार्यालय का था।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “इनवॉइस, एयरवे बिल या लेजर खातों में मुंबई स्थित प्रशासनिक कार्यालय का उल्लेख मात्र दिल्ली की अदालतों के क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं कर सकता, विशेषकर तब जब पक्षकारों के बीच कोई विशेष क्षेत्राधिकार (exclusive jurisdiction) संबंधी शर्त मौजूद न हो। रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री यह दर्शाती है कि कारण-ए-वाद का एक हिस्सा दिल्ली में उत्पन्न हुआ।”

अदालत ने अपने फैसले में Rameshwar Das Dwarka Das (P) Ltd. v. Deepak Puematics (P) Ltd. (2008) मामले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जहां भुगतान किया गया हो या लेन-देन का कोई हिस्सा हुआ हो, वहां क्षेत्राधिकार उत्पन्न हो सकता है।

इसी के साथ हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए रिकवरी सूट को पुनः बहाल कर दिया।

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