कथित ठग सुकेश चंद्रशेखर ने अपने खिलाफ ट्रायल कोर्ट के फैसले में की गई कुछ कथित अपमानजनक टिप्पणियों को हटाने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।

बता दें, ट्रायल कोर्ट ने उसे सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर न्यायिक अधिकारी पर दबाव डालने और अपने मामले में अनुकूल आदेश हासिल करने की कोशिश के मामले में दोषी ठहराया था।

दिल्ली हाईकोर्ट ने फिलहाल याचिका की मेरिट पर सुनवाई नहीं की। कोर्ट पहले यह तय करेगा कि दोषसिद्धि और सजा के बाद संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ऐसी याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं।

जस्टिस मधु जैन ने मामले को इस प्रारंभिक सवाल पर दलीलें सुनने के लिए 3 नवंबर को सूचीबद्ध किया।

दरअसल, सुकेश चंद्रशेखर ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में अपने खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों को हटाने या निरस्त करने की मांग की है। उसका कहना है कि ये टिप्पणियां उसके लिए अपमानजनक हैं। उसने हाईकोर्ट से इन टिप्पणियों के खिलाफ हस्तक्षेप की मांग की।

मामले में दिल्ली सरकार की ओर से याचिका की सुनवाई योग्यता पर आपत्ति जताई गई।

राज्य का कहना है कि जब सुकेश को ट्रायल कोर्ट पहले ही दोषी ठहरा चुका है और सजा भी सुना चुका है, तब वह अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता।

वहीं, सुकेश की ओर से कहा गया कि उसके खिलाफ कई अन्य आपराधिक मामले अभी लंबित हैं। इसलिए ट्रायल कोर्ट के फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों का उन मामलों पर असर पड़ सकता है और इन टिप्पणियों को हटाने के लिए हाईकोर्ट का हस्तक्षेप जरूरी है।

हाईकोर्ट ने फिलहाल इस विवाद पर कोई राय नहीं दी और कहा कि पहले यह देखा जाएगा कि ऐसी याचिका को अनुच्छेद 226 के तहत सुनवाई के लिए स्वीकार किया जा सकता है या नहीं। इसके बाद ही मामले की मूल शिकायत पर विचार होगा।

यह मामला उस आपराधिक मामले से जुड़ा है, जिसमें सुकेश पर सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज के निजी सचिव और बाद में खुद जज बनकर न्यायिक अधिकारी को फोन करने तथा अपने पक्ष में आदेश हासिल करने के लिए दबाव डालने का आरोप है।

ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराते समय सुकेश के आचरण पर कड़ी टिप्पणियां की थीं। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के इरादे से इस तरह का छल सामान्य ठगी से कहीं अधिक गंभीर है।

ट्रायल कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि सुकेश ने पहले कथित तौर पर पहचान बदलकर और प्रभावशाली लोगों के नाम का इस्तेमाल कर लोगों को प्रभावित किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज या उनके सचिव के रूप में पेश होना न्याय व्यवस्था की संस्थागत गरिमा को चुनौती देने जैसा है।

अब दिल्ली हाईकोर्ट के सामने सबसे पहले यह सवाल है कि दोषसिद्धि और सजा के बाद सुकेश की ओर से अनुच्छेद 226 के तहत दायर याचिका सुनवाई योग्य है या नहीं।

इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की दलीलें 3 नवंबर को सुनी जाएंगी।


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