BNSS की धारा 187 के तहत पुलिस रिमांड के लिए सिर्फ़ असली कस्टडी गिनी जाएगी, अंतरिम जमानत पर बिताया गया समय नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS) की धारा 187 के तहत पुलिस रिमांड की ज़्यादा से ज़्यादा मंज़ूर अवधि की गिनती करने के लिए सिर्फ़ उस समय को गिना जा सकता है, जब कोई आरोपी असल में कस्टडी में होता है और अंतरिम जमानत पर बिताया गया समय कस्टडी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस प्रतीक जालान ने केरल हाईकोर्ट के फिसल पीजे बनाम केरल राज्य (2025) के फ़ैसले का ज़िक्र किया, जिसमें यह माना गया कि जिस समय के दौरान आरोपी व्यक्ति को टेम्पररी/अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया, उसे कानूनी जमानत की अवधि की गिनती करने के लिए नहीं गिना जाना चाहिए, क्योंकि सिर्फ़ आरोपी द्वारा बिताई गई असल हिरासत की अवधि को ही गिना जाना चाहिए।
जज ने कहा,
“मैं केरल हाईकोर्ट के फिसल पीजे मामले में लिए गए इस विचार से पूरी तरह सहमत हूं कि BNSS की धारा 187(2) के तहत समय की गिनती के लिए सिर्फ़ असल कस्टडी का समय ही गिना जाएगा। मेरे हिसाब से ऐसा मतलब कानून की सीधी भाषा और ऊपर बताए गए फैसलों के हिसाब से है।”
गौतम नवलखा बनाम नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (2022) पर भी भरोसा किया गया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 167 के संदर्भ में व्यक्ति के डिफ़ॉल्ट बेल के अधिकार को तय करने के लिए कस्टडी के टूटे हुए समय को जोड़ने का ज़िक्र किया।
कोर्ट एक मर्डर के आरोपी की अर्जी पर विचार कर रहा था, जो सेशन कोर्ट द्वारा उसकी अंतरिम मेडिकल जमानत रद्द किए जाने से इस आधार पर नाराज़ था कि अंतरिम जमानत का समय उन दिनों का बड़ा हिस्सा खा जाएगा, जिन पर IO पुलिस कस्टडी रिमांड देने के लिए अप्लाई कर सकता है।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि BNSS की धारा 187 के तहत हिरासत के समय को कैलकुलेट करते समय अस्थायी जमानत पर रिहाई का समय नहीं जोड़ा जाएगा। इसलिए अंतरिम जमानत पर रिहाई उस समय को सीमित नहीं करेगी, जिसके दौरान उसकी पुलिस रिमांड मांगी जा सकती है।
इस बात से सहमत होते हुए हाईकोर्ट ने कहा,
“यह कहने का कोई आधार नहीं था कि अगर आवेदक मेडिकल ग्राउंड पर अंतरिम बेल पर रहता है तो प्रॉसिक्यूशन के पास पुलिस कस्टडी में रिमांड मांगने के लिए जो समय है, वह खत्म हो जाएगा। ठीक से समझा जाए तो ऊपर बताया गया समय BNSS की धारा 187(2) के तहत पुलिस कस्टडी मांगने के लिए उपलब्ध समय के कैलकुलेशन से पूरी तरह बाहर रखा जाएगा।”
इसलिए कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के विवादित ऑर्डर रद्द किया और आठ हफ़्ते की अंतरिम जमानत देने वाला आदेश बहाल किया।