दिव्यांगों को 'पूर्ण सहयोग' देने में कोई कानूनी बाधा नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-23 10:26 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों को पूर्ण सहयोग देने पर दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के तहत कोई कानूनी रोक नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम न बनने का हवाला देकर वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल रोका नहीं जा सकता।

जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव की बेंच एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिनके 78 वर्षीय पति गंभीर बीमारियों जैसे उन्नत डिमेंशिया और अल्जाइमर से पीड़ित हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं।

मामले में साकेत अदालत के प्रिंसिपल जिला एवं सेशन जज द्वारा यह शर्त रखी गई कि मेडिकल रिपोर्ट केवल IHBAS संस्थान से ही ली जाए और मरीज को शारीरिक रूप से पेश किया जाए। याचिकाकर्ता ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि मरीज की हालत बेहद नाजुक है और उसे बार-बार ले जाना जोखिम भरा है।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को पहले ही अधिनियम की धारा 14 के तहत अभिभावक नियुक्त किया जा चुका है और वह नियमित रूप से चिकित्सा रिपोर्ट जमा कर रही हैं। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि संबंधित व्यक्ति को पहले ही अदालत में पेशी से स्थायी छूट दी जा चुकी है।

अदालत ने कहा कि कानून के तहत जरूरत पड़ने पर “पूर्ण सहयोग” प्रदान किया जा सकता है। इसके लिए नियमों का अभाव कोई बाधा नहीं है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह संबंधित जिला जज के समक्ष पूर्ण सहयोग की अनुमति के लिए आवेदन कर सकती हैं। जब तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक मरीज के इलाज करने वाले डॉक्टर की रिपोर्ट को मान्य माना जाएगा और IHBAS की रिपोर्ट की अनिवार्यता समाप्त रहेगी।

इस फैसले को दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और उनकी गरिमा की सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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