दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार (22 अक्टूबर) को 'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन' (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। बोरा ने 16 अक्टूबर को हुए 'लहरा दो तिरंगा' विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के बाद एक जांच के दौरान शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का पर्सनल बॉन्ड और एक ज़मानत (Surety) देने के नोटिस को चुनौती दी थी।

दोनों पक्षों को ढाई घंटे से अधिक समय तक सुनने के बाद जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और कहा कि आदेश शुक्रवार शाम 6 बजे सुनाया जाएगा।

बोरा ने 17 अक्टूबर को एक स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किए गए नोटिस को चुनौती दी। यह नोटिस BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 126 और 130 के तहत जारी किया गया, जिसे धारा 135(3) के साथ पढ़ा जाना चाहिए। (धारा 126 के तहत अगर मजिस्ट्रेट को ऐसी जानकारी मिलती है कि कोई व्यक्ति शांति भंग कर सकता है तो वे उस व्यक्ति से कारण पूछ सकते हैं कि उससे 'पीस बॉन्ड' क्यों न भरवाया जाए। धारा 130 के तहत, मजिस्ट्रेट लिखित आदेश जारी कर सकते हैं, जिसमें कुछ जरूरी विवरण दिए जाते हैं।)

धारा 135(3) के तहत मजिस्ट्रेट लिखित कारणों के साथ उस व्यक्ति को 'पीस बॉन्ड' या ज़मानती बॉन्ड भरने का निर्देश दे सकते हैं, जिसके खिलाफ धारा 130 के तहत आदेश जारी किया गया। इसका उद्देश्य जांच पूरी होने तक शांति बनाए रखना या अच्छा आचरण सुनिश्चित करना है। मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को तब तक हिरासत में भी रख सकते हैं, जब तक कि वह बॉन्ड न भर दे, या अगर वह बॉन्ड नहीं भरता है तो जांच पूरी होने तक उसे हिरासत में रखा जा सकता है।

इसमें यह भी प्रावधान है कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ धारा 127, 128 या 129 के तहत कोई कार्यवाही नहीं की गई तो उसे अच्छा आचरण बनाए रखने के लिए कोई बॉन्ड या ज़मानती बॉन्ड भरने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। धारा 135(1) मजिस्ट्रेट को यह अधिकार देती है कि वे उस जानकारी की सच्चाई की जांच करें, जिसके आधार पर धारा 130 के तहत 'कारण बताओ नोटिस' (शो कॉज नोटिस) जारी करके किसी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की गई।

बोरा की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि याचिकाकर्ता, जो AISA की एक नेता हैं, ने 16 अक्टूबर को एक विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उन्होंने कभी भी किसी तरह की हिंसा का आह्वान नहीं किया।

उन्होंने बताया कि 16 अक्टूबर की शाम को जब बोरा मंडी हाउस पहुंचीं तो उसके 10-15 मिनट बाद ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया। उन्होंने कहा कि उस दिन उन्होंने कोई अपराध नहीं किया था, और न ही शांति भंग करने जैसा कोई काम किया।

उन्होंने कहा कि बोरा को हिरासत में लेना पूरी तरह से गैर-कानूनी था। साथ ही वह किसी अन्य संगठन (CJP) द्वारा दिए गए विरोध प्रदर्शन — जिसमें कनॉट प्लेस सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाना था — में भी शामिल नहीं थीं।

उन्होंने बताया कि हिरासत में लिए जाने के बाद बोरा को तुरंत अपने परिवार या वकीलों से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि जिस इलाके से बोरा को हिरासत में लिया गया, वहां धारा 163 BNSS (उपद्रव या संभावित खतरे के तत्काल मामलों में कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश जारी करने की शक्ति) लागू नहीं थी; हालांकि, उस जगह पर लाउडस्पीकर से यह घोषणा की जा रही थी कि धारा 163 लागू है।

उन्होंने कहा कि इस मामले में कार्यकारी मजिस्ट्रेट सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उनके आदेश या नोटिस का कोई ठोस आधार है। उन्होंने कहा कि अभी 'पर्सनल बॉन्ड' (व्यक्तिगत मुचलका) भरने की नौबत नहीं आई है; यह स्थिति तब आएगी जब मामले की जांच शुरू होगी।

उन्होंने आगे कहा कि 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि जांच के दौरान मजिस्ट्रेट को यह संतुष्ट किया जा सके कि 'शांति बॉन्ड' (पीस बॉन्ड) भरने की आवश्यकता क्यों नहीं है।

उन्होंने कहा,

"यह नोटिस धारा 136 (सुरक्षा देने का आदेश) के तहत कानून द्वारा अनिवार्य की गई आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता है।"

शंकरनारायणन ने कहा कि यह नोटिस केवल औपचारिकता (मैकेनिकल) मात्र है, क्योंकि अंतरिम बॉन्ड की मांग करने के लिए भी व्यक्ति से जवाब मांगने से पहले एक प्रारंभिक जांच होना अनिवार्य है। उन्होंने जोर देकर कहा कि जांच पूरी होने के बाद ही BNSS की धारा 136 के तहत कार्रवाई का चरण आएगा, जिसमें मजिस्ट्रेट याचिकाकर्ता को अच्छा आचरण बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का निर्देश दे सकते हैं।

उन्होंने कहा कि इस मामले में मजिस्ट्रेट का संतुष्ट होना साबित नहीं होता, और जिस जानकारी के आधार पर इस मामले में नोटिस दिया गया, वह केवल "सुनी-सुनाई बात" (Hearsay) थी।

जब ASG चेतन शर्मा ने दिल्ली पुलिस की ओर से अपनी दलीलें पेश करना शुरू किया तो अदालत ने मौखिक रूप से पूछा,

"मान लीजिए कि कोई मजिस्ट्रेट से कहता है कि 'X' वहां मौजूद था और नारे लगा रहा था। इसी आधार पर मजिस्ट्रेट धारा 126 के तहत आदेश जारी कर देता है। बिना कोई जांच किए, और यह पता लगाए बिना कि हो सकता है 'X' वहां था ही नहीं... तो क्या मजिस्ट्रेट के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह खुद संतुष्ट होने के लिए स्वतंत्र रूप से जांच करे कि मिली जानकारी विश्वसनीय है या नहीं?"

अदालत ने आगे पूछा कि जब जांच की जाती है और 'कारण बताओ नोटिस' (शो कॉज नोटिस) पर सुनवाई होती है तो क्या उस व्यक्ति को अपना बचाव करने के लिए दस्तावेज उपलब्ध कराए जाते हैं?

ASG शर्मा ने कहा कि धारा 126 में मजिस्ट्रेट की 'व्यक्तिगत संतुष्टि' (Subjective Satisfaction) का दायरा काफी व्यापक है। इसके लिए जरूरी नहीं कि हर बात सबूत या तथ्य के रूप में साबित हो, बल्कि इसमें बस यह दिखना चाहिए कि मजिस्ट्रेट को क्या जानकारी मिली थी।

इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि जब किसी की स्वतंत्रता खतरे में हो—खासकर तब, जब यह कार्रवाई 'एहतियाती' (Preventive) प्रकृति की हो—तो याचिकाकर्ता के पास बचाव का एकमात्र जरिया 'प्रक्रियात्मक सुरक्षा' (Procedural Safeguard) ही होता है। अदालत ने आगे कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 'कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (Procedure Established by Law) की बात करता है, जिसके आधार पर ही किसी की स्वतंत्रता को सीमित किया जा सकता है।

इसके बाद ASG ने दलील दी कि बोरा ने एक के बाद एक "12 उल्लंघन" किए, और मजिस्ट्रेट ने इन सभी की जांच की थी।

उन्होंने आगे कहा कि जब शांति भंग होने का मामला हो तो धारा 126 और धारा 130 एक साथ लागू होती हैं। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोरा द्वारा "सत्ता परिवर्तन" (Regime Change) को लेकर दिए गए बयानों का जिक्र किया और कहा कि सत्ता परिवर्तन वोटों के जरिए होता है, न कि "नई दिल्ली के मुख्य इलाकों में मौजूद अराजक तत्वों" (Lumpen Elements) के जरिए।

SEM (सब-डिविजनल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) द्वारा मामले में "दिमाग न लगाने" (Non-Application of Mind) के आरोपों पर ASG ने कहा कि उनके पास एक पक्का स्रोत था, 'जनरल डायरी' में एंट्री थी, पुरानी FIR और अपराधों का रिकॉर्ड था, और सड़कों पर बन रहे हालात की जानकारी थी। इसके अलावा, SEM ने जांच अधिकारी (IO) को भी बुलाया था और उनसे स्पष्टीकरण मांगा था।

इस प्रकार, ASG ने कहा कि यह पूरी प्रक्रिया वैसी ही थी, जैसी किसी अपराध का संज्ञान (Cognizance) लेने से पहले की जाने वाली सुनवाई होती है।

इस बीच अदालत ने कहा,

"याचिकाकर्ता की चिंता यह है कि उसे पहले ही 'बुरे लड़के' (Bad Boy) का ठप्पा दे दिया गया, और अब उससे कहा जा रहा है कि उसे 'अच्छा लड़का' (Good Boy) बनना चाहिए। इसी कलंक की वजह से यह पूरी कार्यवाही शुरू हुई है। इसका संबंध अनुच्छेद 21 से भी है।"

इस पर ASG ने सवाल उठाया कि क्या इसका मतलब यह है कि छह FIR को नजरअंदाज कर दिया जाएगा? उन्होंने आगे कहा कि मंडी हाउस सहित उस इलाके में CrPC की धारा 163 लागू थी, जहां से याचिकाकर्ता को हिरासत में लिया गया।

ASG ने कहा,

"वह कहती है कि उसने दूसरे संगठनों से अपना नाता तोड़ लिया है और वह अब अकेली है, लेकिन यह बात गलत साबित होती है, क्योंकि वहां धारा 163 लागू थी। वहां एक बैरिकेड लगा था जिस पर 163 लिखा था; उसे रोका गया, लेकिन पुलिस की संख्या कम होने के कारण वह भाग निकली... वह CP (कनॉट प्लेस) की तरफ भाग गई।"

Case Title : NEHA V/s THE STATE NCT OF DELHI

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