'दोषसिद्धि से बचने की चाल': दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी और पीड़िता की शादी के बावजूद POCSO केस रद्द करने से इनकार किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने POCSO Act के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया, भले ही आरोपी और पीड़िता ने आपस में शादी की हो और उनका एक बच्चा भी हो। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में "सावधानीपूर्वक और संवेदनशीलता से विचार" करने की ज़रूरत होती है और शादी अपने आप में केस बंद करने का आधार नहीं बन सकती।
जस्टिस प्रतीक जालान ने 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर याचिका खारिज की। इस याचिका में 2022 में IPC की धारा 363, 376 और 506, तथा 'यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 4 के तहत दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई थी।
FIR शुरू में पीड़िता के पिता ने दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि उनकी 16 साल की बेटी लापता हो गई। लड़की के घर लौटने के बाद CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज उसके बयान के आधार पर POCSO Act और बलात्कार से संबंधित धाराएं भी केस में जोड़ दी गईं।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि उसने और पीड़िता ने बाद में 10 जुलाई, 2024 को शादी की और जून 2025 में उनकी शादी से एक बच्चा भी हुआ। दिल्ली हाईकोर्ट के पहले के फैसले 'हरमीत सिंह बनाम राज्य (NCT दिल्ली)' का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने आपसी समझौते, वैवाहिक सौहार्द और बच्चे के कल्याण के आधार पर केस रद्द करने की मांग की।
राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए बताया कि ट्रायल (मुकदमा) पहले ही पूरा हो चुका है और अब केवल फैसले का इंतज़ार है। यह दलील भी दी गई कि याचिकाकर्ता ने पहले भी इसी तरह की एक याचिका दायर की, जिसे दोबारा याचिका दायर करने की अनुमति लिए बिना ही वापस ले लिया गया।
राज्य सरकार ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता ने सेशंस कोर्ट द्वारा लगाई गई ज़मानत की एक शर्त का उल्लंघन किया। इस शर्त के तहत उसे पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों से संपर्क करने से मना किया गया, जबकि उसने ज़मानत की अवधि के दौरान ही शादी की थी।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि हालांकि अदालतों के पास ऐसे मामलों में भी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की अंतर्निहित शक्तियां होती हैं, जिनमें अपराधों में समझौता नहीं किया जा सकता (non-compoundable offences), लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के लिए लगातार कुछ अपवाद तय किए।
हरमीत सिंह मामले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने फिर दोहराया कि समझौते के आधार पर POCSO की कार्यवाही रद्द करना पूरी तरह से मना नहीं है, लेकिन इसके लिए बारीकी से न्यायिक जांच की ज़रूरत होती है, ताकि यह पक्का हो सके कि यह समझौता असली है और सज़ा से बचने का कोई बहाना नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अपराध रद्द करने से पहले यह जांच करना ज़रूरी है कि क्या पीड़ित ने अपनी मर्ज़ी से काम किया, क्या उसने शुरू से ही केस का लगातार विरोध किया और क्या शादी असली लग रही थी या सिर्फ़ सज़ा से बचने की कोई चाल थी।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि पीड़ित लड़की ने CrPC की धारा 164 के तहत अपने बयान में और ट्रायल कोर्ट के सामने अपनी गवाही में भी केस को बंद करने की मांग करने के बजाय केस का ही समर्थन किया था।
कोर्ट ने कहा,
“इसलिए यह ऐसा मामला नहीं है, जहां पीड़ित लड़की ने शुरू से ही केस का लगातार विरोध किया हो, या उसके और याचिकाकर्ता के बीच के रिश्ते में अपनी मर्ज़ी का कोई भी ज़िक्र किया हो। ऊपर बताई गई परिस्थितियाँ मुझे इस स्तर पर इस नतीजे पर पहुंचने से रोकती हैं कि दोनों पक्षों के काम, जैसा कि हरमीत सिंह मामले के पैराग्राफ़ 36.3 में ज़रूरी है, पीड़ित की तरफ़ से अपनी मर्ज़ी से किए गए।”
कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले में ज़मानत की उस शर्त का “साफ़ तौर पर उल्लंघन” होता दिख रहा है, जो आरोपी को पीड़ित लड़की और उसके परिवार से संपर्क करने से रोकती है।
इसलिए यह मानते हुए कि इस मामले में कोर्ट की विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए ज़रूरी “असाधारण परिस्थितियां” नहीं दिख रही हैं, कोर्ट ने कार्यवाही को रद्द करने से मना कर दिया।
Case title: Sonu v. State