दिल्ली हाईकोर्ट ने दोस्तों के बीच हुए झगड़े और मारपीट से जुड़े आपराधिक मामले में पक्षकारों के बीच समझौता होने के बाद FIR और आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब पक्षकारों ने अपने मतभेद दूर कर लिए हैं और अब उनके बीच कोई शिकायत नहीं है तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखना किसी सार्थक उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा बल्कि उनके बीच विवाद और कटुता को बनाए रखेगा।

जस्टिस प्रतीक जालान ने हालांकि FIR रद्द करने को दो आरोपियों की सामुदायिक सेवा और दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के कॉस्ट अकाउंट में कुल 10 हजार रुपये जमा कराने की शर्त से जोड़ा। आरोपियों को मणिपुर के रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में कुल छह सत्रों में सामुदायिक सेवा करनी होगी। प्रत्येक सत्र दो घंटे का होगा और यह सेवा दो महीने के भीतर पूरी करनी होगी।

मामला डाबरी थाना क्षेत्र में दर्ज FIR से जुड़ा था। FIR 9 मार्च 2025 को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 110 और 3(5) के तहत दर्ज की गई। शिकायतकर्ता ने बताया कि वह अपने दोस्त के साथ किराये के फ्लैट में रहता था। आरोप था कि याचिकाकर्ता और एक सह-आरोपी सुबह करीब पांच बजे जबरन फ्लैट में घुस आए और उसके तथा उसके दोस्त के साथ मारपीट की।

आरोप था कि उनमें से एक व्यक्ति को लात-घूंसों से पीटा गया, जिससे वह गिरकर रसोई के स्लैब से सिर टकरा बैठा और उसके सिर में चोट आई।

हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि मेडिको-लीगल सर्टिफिकेट में चोट को गंभीर बताया गया लेकिन सिर की चोट शिकायतकर्ता के दोस्त द्वारा कथित मुक्का लगने के बाद रसोई के स्लैब से सिर टकराने के कारण हुई। FIR में किसी आग्नेयास्त्र या धारदार हथियार के इस्तेमाल का आरोप नहीं था और न ही सिर की चोट पहुंचाने के लिए कोई अलग से किया गया कृत्य बताया गया।

जांच लंबित रहने के दौरान पक्षकारों ने समझौता कर लिया और सेटलमेंट डीड पेश की। उन्होंने हाईकोर्ट को बताया कि समझौता स्वेच्छा से हुआ है और इसमें किसी तरह का दबाव, अनुचित प्रभाव या जबरदस्ती नहीं थी। घायल व्यक्ति ने भी अदालत को बताया कि वह चोट से पूरी तरह उबर चुका है और अब उसका कोई स्थायी दुष्प्रभाव नहीं है। पक्षकारों ने कहा कि वे अब भी दोस्त हैं और एक-दूसरे के खिलाफ कोई शिकायत बाकी नहीं है।

जस्टिस जालान ने कहा कि विवाद दोस्तों के बीच हुए झगड़े से पैदा हुआ और FIR दर्ज होने के कुछ समय बाद ही पक्षकारों ने अपने मतभेद सुलझा लिए। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि घायल व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ हो चुका है, धारदार हथियार या आग्नेयास्त्र के इस्तेमाल का कोई आरोप नहीं है और भारतीय न्याय संहिता की धारा 110 का आरोप भी हटा दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में आपराधिक कार्यवाही जारी रखने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं होगा और इससे पक्षकारों के बीच विवाद तथा कटुता ही बनी रहेगी। अदालत ने यह भी माना कि मामले में दोषसिद्धि की संभावना बेहद कम है और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना किसी उपयोगी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित अधिकारिता का इस्तेमाल करते हुए FIR और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। साथ ही, आरोपियों को मणिपुर में निर्धारित सामुदायिक सेवा पूरी करने और 10 हजार रुपये की राशि जमा कराने का निर्देश दिया।

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