POCSO मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- यौन हमले को साबित करने के लिए हाइमेन फटना जरूरी नहीं
दिल्ली हाईकोर्ट ने छह वर्षीय बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के दोषी व्यक्ति की सजा बरकरार रखते हुए कहा कि POCSO कानून के तहत भेदन संबंधी यौन हमले को साबित करने के लिए हाइमेन का फटना जरूरी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यूनतम प्रवेश भी इस अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त है।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने यह टिप्पणी राजेंद्र शर्मा की अपील पर सुनवाई करते हुए की। राजेंद्र शर्मा को POCSO कानून की धारा 6 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(2)(एफ) के तहत दोषी ठहराया गया। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा लेकिन उसकी सजा 20 साल के कठोर कारावास से घटाकर 14 साल की।
अभियोजन के अनुसार 13 जनवरी, 2013 को आरोपी ने संगम विहार स्थित पीड़िता के घर में जहां वह किरायेदार था, छह वर्षीय बच्ची के साथ भेदन संबंधी यौन हमला किया। अगले दिन बच्ची के बयान के आधार पर FIR दर्ज की गई।
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि पीड़िता के बयान में घटना स्थल को लेकर विरोधाभास हैं और वैज्ञानिक साक्ष्य तथा नमूनों की जब्ती प्रक्रिया भी विश्वसनीय नहीं है। यह भी कहा गया कि मेडिकल जांच में बच्ची का हाइमेन सुरक्षित पाया गया, जिससे भेदन संबंधी यौन हमले का आरोप कमजोर पड़ता है।
हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज किया। कोर्ट ने POCSO Act की धारा 3(ए) का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी बच्चे के शरीर में किसी भी सीमा तक प्रवेश किया जाता है तो भेदन संबंधी यौन हमला माना जाएगा।
अदालत ने कहा,
“धारा 3(ए) के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अपने अंग का किसी भी सीमा तक प्रवेश करता है तो अपराध बन जाता है। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि हाइमेन फटा हुआ हो।”
कोर्ट ने यह भी माना कि फोरेंसिक सैंपल की जब्ती और उन्हें साबित करने में कुछ कमियां थीं लेकिन वैज्ञानिक साक्ष्य केवल सहायक प्रकृति के होते हैं। अदालत ने कहा कि बच्ची की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद है।
साथ ही हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट वर्ष 2013 में लागू POCSO Act के प्रावधानों के तहत 20 साल की सजा नहीं दे सकता था। इसी आधार पर अदालत ने सजा घटाकर 14 साल का कठोर कारावास की।