ट्रांसजेंडर संशोधन कानून 2026 पर सवाल, दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों से जुड़े संशोधन कानून 2026 को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 22 जुलाई को तय की।
चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने बुधवार को सुनवाई करते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया। याचिका चंद्रेश जैन द्वारा दायर की गई, जिसमें कहा गया कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक नालसा फैसले द्वारा स्थापित सिद्धांतों को कमजोर करता है।
याचिका में आरोप लगाया गया कि नया कानून लिंग पहचान के लिए चिकित्सा और प्रशासनिक सत्यापन को अनिवार्य बनाता है, जिससे व्यक्ति की स्वयं की पहचान का अधिकार खत्म होकर राज्य के नियंत्रण में चला जाता है।
मूल कानून में ट्रांसजेंडर की परिभाषा ऐसे व्यक्ति के रूप में की गई, जिसका जेंडर जन्म के समय निर्धारित जेंडर से मेल नहीं खाता, चाहे उसने सर्जरी या हार्मोन थेरेपी करवाई हो या नहीं। लेकिन संशोधित कानून में ऐसे लोगों को बाहर कर दिया गया, जो बिना किसी मेडिकल प्रक्रिया के अपनी पहचान स्वयं निर्धारित करते हैं, जैसे ट्रांससेक्सुअल और नॉन-बाइनरी व्यक्ति।
याचिकाकर्ता का कहना है कि यह बदलाव संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a) और 21 के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन है। इसे “मौलिक अधिकारों की वापसी” के रूप में देखा जाना चाहिए।
याचिका में कहा गया,
“यह संशोधन व्यवहारिक रूप से गंभीर असर डालता है, क्योंकि जेंडर पहचान की कानूनी मान्यता सीधे पहचान पत्र, सरकारी योजनाओं और आपराधिक कानून के तहत सुरक्षा से जुड़ी होती है। इससे भेदभाव और न्याय से वंचित होने का खतरा पैदा होता है।”
याचिका में कानून की कई धाराओं को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई। साथ ही यह भी मांग की गई कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान स्वयं तय करने का अधिकार मौलिक अधिकारों का हिस्सा माना जाए।
इसके अलावा अदालत से यह निर्देश देने की भी मांग की गई कि देशभर की पुलिस और जांच एजेंसियां ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की शिकायतों को बिना किसी अतिरिक्त सत्यापन के दर्ज करें और उन पर कार्रवाई करें।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि केवल प्रशासनिक प्रमाण पत्र के अभाव में किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को आपराधिक कानून के तहत सुरक्षा से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।