UPSC में ऑटिज्म व मानसिक बीमारियों वाले अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर करने पर हाइकोर्ट सख्त, केंद्र से जवाब तलब
दिल्ली हाइकोर्ट ने सिविल सेवा परीक्षा में ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता, विशेष सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी से पीड़ित अभ्यर्थियों को आरक्षण से बाहर रखने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और संघ लोक सेवा आयोग से जवाब मांगा।
चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से जवाब एक सक्षम अधिकारी द्वारा दाखिल किया जाए और इसमें संबंधित सभी विभागों से परामर्श लिया जाए जबकि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय अलग से अपना जवाब दाखिल करेगा।
याचिका में कहा गया कि वर्ष 2026 की सिविल सेवा परीक्षा की अधिसूचना में दिव्यांगजन अधिकार कानून, 2016 की धारा 34(1)(d) के तहत आने वाले अभ्यर्थियों जैसे ऑटिज्म, बौद्धिक दिव्यांगता, विशेष सीखने की अक्षमता और मानसिक बीमारी को आरक्षण के लाभ से बाहर कर दिया गया।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इन अभ्यर्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति तो दी जाती है लेकिन उन्हें आरक्षण और सेवा आवंटन का लाभ नहीं दिया जाता जिससे यह पूर्ण बहिष्कार बन जाता है।
याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 16 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करती है, जो समानता, भेदभाव निषेध और जीवन के अधिकार की गारंटी देते हैं।
याचिका में कहा गया कि दिव्यांगजन अधिकार कानून के तहत ऐसे अभ्यर्थियों को आरक्षण देना अनिवार्य है लेकिन अधिसूचना इसके विपरीत जाकर उन्हें बाहर कर रही है। साथ ही यह भी कहा गया कि सरकार द्वारा जिन पदों को दिव्यांगजनों के लिए उपयुक्त माना गया है उनमें ये श्रेणियां भी शामिल हो सकती हैं, इसलिए उनका पूर्ण बहिष्कार मनमाना और अनुचित है।
हाइकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को तय की।