'सज़ा के बदले सुधार पर ज़ोर': दिल्ली हाईकोर्ट ने 1993 के बोबाज़ार ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सज़ा काट रहे व्यक्ति को समय से पहले किया रिहा

Update: 2026-06-17 05:56 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने सज़ा के मामले में सुधारवादी नज़रिया अपनाते हुए 1993 के बोबाज़ार ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सज़ा काट रहे मोहम्मद राशिद खान को समय से पहले रिहा करने का आदेश दिया।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली सज़ा के बदले सज़ा देने (retributive) के सिद्धांत से आगे बढ़कर सुधारवादी नज़रिए को अपना चुकी है।

कोर्ट ने कहा,

"असल में, यह मामला याचिकाकर्ता मोहम्मद राशिद खान की समय से पहले रिहाई से जुड़ा है। वह 3 मार्च 1993 से यानी लगभग 33 साल से न्यायिक हिरासत में है। उसे पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर में हुए भयानक बम धमाके के लिए TADA Act और IPC की धारा 34 के तहत उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई। यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि भारतीय न्यायिक प्रणाली ने सज़ा के बदले सज़ा देने के बजाय सुधारवादी नज़रिया अपनाया। समय से पहले रिहाई के मामले पर विचार करते समय खास तौर पर सुधारवादी नज़रिए को अपनाया जाता है।"

राशिद खान को कोलकाता में 1993 के बोबाज़ार ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराया गया और IPC, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (TADA Act) के प्रावधानों के तहत उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।

खान ने दलील दी कि उसने जेल में 33 साल से ज़्यादा समय बिताया, जेल में उसका व्यवहार अच्छा रहा है और उसने काफी सुधार दिखाया।

उसने ऐसी रिपोर्टों का भी हवाला दिया, जिनमें समाज में दोबारा घुलने-मिलने की सकारात्मक संभावना जताई गई और बताया कि उसे पहले भी पैरोल पर रिहा किया गया और उस दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।

केंद्र सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले अपराधों के लिए TADA के तहत दोषी ठहराया गया और अपराध की गंभीरता तथा कानून लागू करने वाली एजेंसियों से मिली नकारात्मक जानकारी के आधार पर उसकी समय से पहले रिहाई की मांग को खारिज कर दिया गया।

पश्चिम बंगाल सरकार ने भी अपराध की गंभीरता और समाज पर इसके असर का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया।

शुरुआत में, हाईकोर्ट ने सज़ा में छूट और समय से पहले रिहाई से जुड़े सिद्धांतों की जांच की और कहा कि आधुनिक दंड-विज्ञान (penology) सुधार और समाज में दोबारा शामिल होने पर ज़ोर देता है।

'स्टेट ऑफ़ गुजरात बनाम हाईकोर्ट ऑफ़ गुजरात (1998)' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध विशेषज्ञों (criminologists) द्वारा की गई आधुनिक जांच-पड़ताल से अपराध और सज़ा के प्रति पूरे नज़रिए में बहुत बड़ा बदलाव आया है। सज़ा देने का मकसद अब बदला की भावना से हटकर सुधार और इलाज पर केंद्रित हो गया, ताकि बीमार अपराधी के भीतर से उस मूल व्यक्ति को फिर से जगाया जा सके जो मानसिक रूप से स्वस्थ था।

इस मामले में कोर्ट ने याचिकाकर्ता की लंबी जेल की सज़ा, जेल में उसके व्यवहार और समय से पहले रिहाई के पीछे की सुधारवादी सोच को ध्यान में रखा।

इसी आधार पर कोर्ट ने खान को रिहा करने का आदेश देते हुए कहा,

“यह माना गया कि सज़ा का मुख्य मकसद सुधार होना चाहिए और जेल में रहने के दौरान, दोषी कैदी के भीतर से एक अच्छे इंसान को फिर से तैयार करने की हर संभव कोशिश की जानी चाहिए।”

Case title: Md. Rashid Khan v. Union of India & Ors.

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