सामान्य आरोपों के आधार पर पूरे शहर से अवैध धार्मिक ढांचे हटाने का आदेश नहीं दिया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-07-23 11:10 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने राजधानी की सार्वजनिक भूमि से सभी अवैध धार्मिक ढांचों और अन्य अतिक्रमणों को हटाने की मांग वाली जनहित याचिका खारिज की। अदालत ने कहा कि याचिका में लगाए गए आरोप सामान्य और व्यापक हैं तथा किसी विशेष स्थान या अतिक्रमण का स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया। ऐसे में इस तरह के व्यापक निर्देश जारी नहीं किए जा सकते।

चीफ जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि सार्वजनिक पार्कों, हरित पट्टियों, खेल मैदानों, सड़कों, फुटपाथों, नागरिक सुविधाओं के लिए आरक्षित स्थलों और अन्य सार्वजनिक भूमि पर बने सभी अनधिकृत धार्मिक ढांचों को हटाने का निर्देश दिया जाए। इसके साथ ही सार्वजनिक भूमि पर बने अवैध व्यावसायिक और आवासीय निर्माण हटाने, पार्कों और खुले स्थानों को बहाल करने, क्षेत्रवार और वार्डवार अतिक्रमण का विवरण तैयार करने, भविष्य में अतिक्रमण रोकने के लिए संयुक्त विशेष कार्यबल गठित करने, लापरवाह अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने और शिकायतों के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाने की भी मांग की गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में की गई सभी प्रार्थनाएं अत्यंत व्यापक और सामान्य प्रकृति कीं। अदालत के समक्ष किसी विशेष स्थान पर हुए अतिक्रमण, अवैध निर्माण या उसके स्वरूप से संबंधित कोई ठोस तथ्य नहीं रखा गया।

अदालत ने कहा,

"किसी विशेष स्थान पर अतिक्रमण या अवैध निर्माण से संबंधित स्पष्ट आरोप और विवरण के अभाव में याचिकाकर्ता की मांग के अनुरूप इतने व्यापक निर्देश जारी करना संभव नहीं है।"

हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वह किसी विशेष स्थान और अतिक्रमण से संबंधित ठोस तथ्यों तथा उचित आधार के साथ नई याचिका दायर करता है, तो वह कानून के अनुसार विचार योग्य होगी।

इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने जनहित याचिका खारिज की।

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