दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में जज द्वारा मध्यस्थता पर उठे सवालों वाली जनहित याचिका निपटाई, याचिकाकर्ता को समिति के पास जाने का निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट में जजों द्वारा स्वयं मध्यस्थता करने और बाद में उसी मामले की सुनवाई करने की प्रथा को लेकर दायर जनहित याचिका का निपटारा किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस विषय पर उचित होगा कि याचिकाकर्ता संबंधित जजों की समिति के समक्ष अपनी बात रखे।
चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता फैमिली कोर्ट्स से जुड़े मामलों को देखने वाली समिति के समक्ष प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करे। अदालत ने यह भी कहा कि समिति याचिकाकर्ता के सुझावों पर शीघ्रता से विचार करे।
याचिका में यह गंभीर मुद्दा उठाया गया कि फैमिली कोर्ट के पीठासीन जज खुद ही बंद कमरे में अनौपचारिक और बिना रिकॉर्ड के समझौता वार्ता करते हैं और यदि समझौता नहीं हो पाता तो वही जज बाद में उसी विवाद का निर्णय भी करते हैं।
याचिका में कहा गया कि समझौते को बढ़ावा देने का उद्देश्य सराहनीय है लेकिन जिस तरीके से यह प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वह कानूनी और संवैधानिक सवाल खड़े करती है। जज का एक ही मामले में पहले मध्यस्थ और बाद में निर्णयकर्ता की भूमिका निभाना निष्पक्षता की भावना को कमजोर कर सकता है।
इसमें यह भी कहा गया कि ऐसी प्रक्रिया से पक्षकारों में पक्षपात की आशंका पैदा हो सकती है और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भरोसा कम हो सकता है।
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि यदि कोई मामला किसी जज के समक्ष लंबित है तो वह जज निजी या अनौपचारिक मध्यस्थता में हिस्सा न लें और यदि ऐसा किया गया हो तो बाद में उसी मामले की सुनवाई न करें।
हालांकि हाईकोर्ट ने सीधे इस पर कोई आदेश देने के बजाय मामले को संबंधित समिति के विचार के लिए छोड़ दिया, जिससे इस संवेदनशील मुद्दे पर संस्थागत स्तर पर निर्णय लिया जा सके।