झुग्गी हटाकर वैकल्पिक आवास देना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं, यदि DUSIB नियमों का पालन हो : दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-05-11 12:18 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि झुग्गी बस्तियों से लोगों को हटाकर उन्हें वैकल्पिक आवास देना अपने आप में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जाएगा, बशर्ते दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) की नीति और प्रोटोकॉल में तय सुरक्षा उपायों का पालन किया जाए।

जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव भाई राम कैंप, DID कैंप और मस्जिद कैंप के निवासियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे थे। इन याचिकाओं में निवासियों ने उन्हें हटाकर सवदा घेवर्रा में वैकल्पिक आवास दिए जाने को चुनौती दी थी।

अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आश्रय और आजीविका का मौलिक अधिकार प्राप्त है।

अदालत ने कहा,

“ये अधिकार जीवन के मौलिक अधिकार से गहराई से जुड़े हुए हैं और इनमें से किसी एक का उल्लंघन सामान्यतः अन्य अधिकारों के उल्लंघन के समान होगा।”

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पुनर्वास की प्रक्रिया DUSIB की नीति और प्रोटोकॉल के अनुसार की जाती है और प्रभावित लोगों के हित सुरक्षित रखे जाते हैं तो केवल बेदखली और पुनर्वास को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

ई कोर्ट ने कहा कि संबंधित प्राधिकरणों का दायित्व है कि वे अपनी नीति के अनुसार यह सुनिश्चित करें कि पुनर्वास का प्रभावित लोगों के जीवन पर न्यूनतम असर पड़े।

अदालत ने ओल्गा टेलिस बनाम महाराष्ट्र राज्य मामला का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के अधिकारों पर कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया के तहत सीमित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा था कि सवदा घेवर्रा स्थित पुनर्वास स्थल उनके कार्यस्थलों और बच्चों के स्कूलों से काफी दूर है, जिससे उनकी आजीविका और शिक्षा प्रभावित होगी।

वहीं सरकारी पक्ष ने दलील दी कि संबंधित झुग्गी बस्तियां संवेदनशील रक्षा प्रतिष्ठानों और सक्रिय वायुसेना स्टेशन के पास स्थित है, इसलिए उन्हें हटाना आवश्यक है।

अदालत ने कहा कि एक ओर निवासियों के आश्रय और आजीविका के अधिकार हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य के वैध सुरक्षा हित भी महत्वपूर्ण हैं।

साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि DUSIB प्रोटोकॉल के तहत पुनर्वास स्थलों पर स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं, परिवहन, पेयजल और स्वच्छता जैसी मूल सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट ने माना कि प्राधिकरणों ने DUSIB नीति और प्रोटोकॉल की हर प्रक्रिया का सख्ती से पालन नहीं किया, लेकिन इससे याचिकाकर्ताओं को कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ क्योंकि सभी निवासियों को पुनर्वास के लिए पात्र घोषित किया गया और कई कमियां बाद में दूर कर दी गईं।

अदालत ने अंत में अधिकारियों को निर्देश दिया कि वैकल्पिक आवास स्थल पर शिक्षा, परिवहन, पानी और स्वच्छता से जुड़ी सभी सुविधाएं DUSIB मानकों के अनुसार सुनिश्चित की जाएं।

साथ ही अदालत ने उन निवासियों को, जिन्होंने अभी तक आवंटन पत्र स्वीकार नहीं किए, 15 दिनों के भीतर उन्हें स्वीकार कर वर्तमान कैंप खाली करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा कि ऐसा नहीं करने पर प्रशासन कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकेगा।

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