दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की बायोमेट्रिक अटेंडेंस पर आपत्ति जताने वाली अर्ज़ी पर फ़ैसला लेने का निर्देश दिया
दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह चार हफ़्ते के अंदर 'दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन' की उस अर्ज़ी पर फ़ैसला करे, जिसमें पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस की ज़रूरत पर आपत्ति जताई गई।
कोर्ट एसोसिएशन की एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में मांग की गई थी कि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के लिए अनिवार्य बायोमेट्रिक अटेंडेंस से जुड़े दिल्ली सरकार के सर्कुलर को रद्द किया जाए, या फिर इन सर्कुलर को लागू करने पर रोक लगाई जाए और पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के लिए कोई व्यावहारिक और कोर्ट-केंद्रित अटेंडेंस सिस्टम शुरू किया जाए।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने आदेश में कहा:
"...यह कोर्ट उचित समझता है कि इस कोर्ट में दायर मौजूदा याचिका को याचिकाकर्ता की ओर से एक अर्ज़ी (रिप्रेजेंटेशन) माना जाए। साथ ही प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का मौका देने के बाद इस तारीख से चार हफ़्ते के भीतर इस पर फ़ैसला लें और याचिकाकर्ता को इसकी जानकारी दें।"
याचिका में कहा गया कि दिल्ली सरकार ने डायरेक्टरेट ऑफ़ प्रॉसिक्यूशन समेत सरकारी विभागों के लिए 08.04.2026 से बायोमेट्रिक अटेंडेंस शुरू की थी। बायोमेट्रिक सिस्टम लगने तक प्रॉसिक्यूटर को 27.04.2026 से अपनी फ़िज़िकल अटेंडेंस (हाज़िरी) लगानी थी।
याचिकाकर्ता एसोसिएशन ने 28.04.2026 को एक अर्ज़ी देकर इस ज़रूरत पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर कोर्ट के अधिकारी होते हैं, जिन्हें अलग-अलग कोर्ट में जाना पड़ता है और अपनी ड्यूटी के दौरान पुलिस स्टेशन और दूसरी जगहों पर भी जाना पड़ता है।
यह तर्क दिया गया कि उस अर्ज़ी पर न तो कोई विचार किया गया और न ही कोई फ़ैसला लिया गया। इसके बावजूद, डायरेक्टरेट ने 16.07.2026 और 21.07.2026 के कम्युनिकेशन के ज़रिए प्रॉसिक्यूटर को AEBAS (आधार इनेबल्ड बायोमेट्रिक अटेंडेंस सिस्टम) पर खुद को रजिस्टर करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ता एसोसिएशन की बाद की अर्ज़ियों पर भी कोई फ़ैसला नहीं लिया गया, जबकि होम डिपार्टमेंट ने 24.07.2026, 31.07.2026 और 03.08.2026 के कम्युनिकेशन के ज़रिए ज़िला दफ़्तरों और कोर्ट कॉम्प्लेक्स में AEBAS लागू करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता एसोसिएशन ने पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के लिए AEBAS को अनिवार्य रूप से लागू करने को चुनौती दी। उनका तर्क था कि उनके काम की प्रकृति को देखते हुए यह सिस्टम व्यावहारिक नहीं है और उनकी उपस्थिति वैसे भी कोर्ट के रिकॉर्ड और कार्यवाही में दर्ज होती है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि अधिकारियों ने याचिकाकर्ता एसोसिएशन की ओर से दी गई आपत्तियों या सुझावों पर विचार किए बिना ही इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि अगर उन्हें आगे कोई शिकायत हो तो वे नई याचिका के साथ हाई कोर्ट जा सकते हैं।
Case title: DELHI PROSECUTORS WELFARE ASSOCIATION v/s STATE GNCT OF DELHI AND ANR