दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि वकील-मुवक्किल के बीच कानूनी रूप से संरक्षित गोपनीय संवाद और दस्तावेजों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सुरक्षा वकील के खिलाफ जांच में पूर्ण बाधा नहीं बन सकती। यदि जांच एजेंसियों के सामने प्रथमदृष्टया ऐसी सामग्री हो, जिससे संकेत मिले कि वकील केवल कानूनी सलाहकार की भूमिका तक सीमित नहीं है और खुद जांच के दायरे में आए मामलों में शामिल हो सकता है, तो उसके कार्यालय की तलाशी ली जा सकती है।

जस्टिस अनिल क्षतरपाल और जस्टिस शैल जैन की खंडपीठ ने अधिवक्ता पुनीत बत्रा की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

बत्रा ने अपनी लॉ फर्म बास लीगल एलएलपी के परिसर, जिसमें उनका केबिन भी शामिल था, में GST विभाग द्वारा की गई तलाशी को चुनौती दी। तलाशी के दौरान अधिकारियों ने उनका CPU और कुछ दस्तावेज जब्त किए।

हाईकोर्ट ने तलाशी और जब्ती में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि वकील-मुवक्किल के बीच गोपनीय और विशेषाधिकार प्राप्त संवाद को कानून में मिली सुरक्षा कमजोर नहीं की जा सकती।

अदालत ने कहा कि उसके फैसले का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि वकीलों के कार्यालयों की बेरोकटोक तलाशी की अनुमति दी गई।

मामले में बत्रा का कहना था कि जब्त कंप्यूटर में उनके मुवक्किलों से संबंधित गोपनीय और विशेषाधिकार प्राप्त संवाद हो सकते हैं। इनमें गेमिंग कंपनी मार्टकर्मा टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड (MTPL) भी शामिल थी, जिसके लिए उन्होंने कानूनी और पेशेवर सेवाएं प्रदान की थीं।

वहीं, GST विभाग का दावा था कि बत्रा केवल MTPL के वकील के रूप में काम नहीं कर रहे थे, बल्कि कंपनी के कामकाज में सक्रिय रूप से शामिल हैं। विभाग ने जांच के दौरान दर्ज किए गए बयानों और अन्य सामग्री का हवाला देते हुए उनकी भूमिका को जांच का विषय बताया।

पीठ ने कहा कि उसके सामने रखी गई सामग्री पर विचार केवल यह तय करने के लिए किया जा रहा है कि जांच आगे बढ़ाने का आधार मौजूद है या नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने वकील की दोषिता या कानूनी जिम्मेदारी के संबंध में कोई निष्कर्ष दिया।

अदालत ने माना कि बास लीगल एलएलपी और बत्रा के केबिन की तलाशी CGST Act की धारा 67(2) के तहत जारी वैध प्राधिकरण के आधार पर की गई। केवल इस वजह से कि संबंधित व्यक्ति वकील है, तलाशी को अवैध नहीं माना जा सकता।

हालांकि, आगे की जांच के लिए हाईकोर्ट ने GST अधिकारियों को पहले से तैयार किए गए डेटा की क्लोन कॉपी का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया।

अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वे केवल MTPL के मामलों से संबंधित जांच सामग्री की ही जांच करें और बत्रा के अन्य मुवक्किलों से संबंधित ऐसी जानकारी को न खोलें, न देखें और न जांचें, जिसका MTPL के मामलों से कोई संबंध नहीं है।

पीठ ने कहा कि अन्य मुवक्किलों से संबंधित जानकारी और दस्तावेजों की गोपनीयता से समझौता नहीं होना चाहिए। हालांकि, यदि किसी अन्य मुवक्किल से संबंधित कोई विशेष सामग्री जांच के लिए प्रासंगिक सामने आती है तो अधिकारी कानून के अनुसार हाईकोर्ट से उचित आदेश लेने के लिए स्वतंत्र होंगे।

अदालत ने इस तरह याचिका खारिज करते हुए तलाशी और जब्ती बरकरार रखी, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि वकील के कार्यालय की तलाशी का अधिकार असीमित नहीं है। वास्तविक वकील-मुवक्किल गोपनीय सामग्री को कानून के तहत उपलब्ध संरक्षण जारी रहेगा।

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