दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 साल बाद पुलिसकर्मी पर चाकू से हमला करने के आरोपी की सजा बरकरार रखी

Update: 2026-03-19 04:36 GMT

एक पुलिस अधिकारी पर "साहसी हमले" के दो दशक से भी ज़्यादा समय बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने उस व्यक्ति की सज़ा और दोषसिद्धि बरकरार रखी, जिसने पिछली पुलिस कार्रवाई के दौरान रोके जाने के बदले में एक हेड कांस्टेबल पर चाकू से हमला किया था।

जस्टिस विमल कुमार यादव ने आरोपी द्वारा दायर अपील खारिज की और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास), 392, 394 और 397 (लूट) के तहत उसकी दोषसिद्धि की पुष्टि की।

यह मामला अप्रैल 2002 का है, जब हेड कांस्टेबल सुरेश कुमार ड्यूटी के बाद घर लौट रहे थे, तभी दिल्ली के वज़ीरपुर के पास उन पर हमला किया गया।

आरोपी ने अपने साथियों के साथ मिलकर उन पर घूंसे और लात-घूसों से हमला किया। फिर उनके पेट और जांघ में चाकू घोंप दिया। भागने से पहले उन्होंने पुलिसकर्मी का निजी सामान भी लूट लिया।

कथित तौर पर इस हमले की वजह एक पुरानी घटना थी, जब उसी पुलिस अधिकारी ने आरोपी से जुड़े एक वाहन को रोका था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि आरोपी ने इस शिकायत को "मन में पाल रखा था", जिसके चलते उसने यह हमला किया।

दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कोर्ट ने घायल पुलिसकर्मी की गवाही पर काफी भरोसा किया।

कोर्ट ने कहा,

"घायल गवाह की गवाही को अतिरिक्त महत्व दिया जाना चाहिए।"

इसके लिए 'स्टेट ऑफ़ यू.पी. बनाम नरेश और अन्य (2011)' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घायल गवाह की गवाही को कानून में एक विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए, जब तक उसे खारिज करने के कोई ठोस आधार न हों, तब तक उस पर भरोसा किया जाना चाहिए।

एक दलील यह दी गई कि अपीलकर्ता को फंसाने का एक मकसद था, क्योंकि कथित तौर पर अपीलकर्ता पुलिस की गिरफ्त से बचकर निकल गया। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि इसके विपरीत अपीलकर्ता के पास ही अधिकारी पर हमला करने का एक कारण था।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"अपनी गवाही में पीड़ित ने साफ तौर पर कहा कि जब उस पर हमला किया जा रहा था, तो कुछ ऐसी बातें कही गईं जिनसे यह संकेत मिलता था कि अपीलकर्ता बहुत गुस्से में था..."

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि चोटों की प्रकृति और स्थान—विशेष रूप से पेट और जांघ पर चाकू के घाव—अभियोजन पक्ष की कहानी की पुष्टि करते थे और यह संकेत देते थे कि हमले में किसी धारदार हथियार का इस्तेमाल किया गया। अदालत ने यह माना कि चोटें, साथ ही हमले का तरीका और इस्तेमाल किया गया हथियार, IPC की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए आवश्यक इरादे को साबित करने के लिए पर्याप्त थे।

अपीलकर्ता ने इस आधार पर सज़ा कम करने की भी मांग की कि घटना को 23 साल बीत चुके हैं। उसके ऊपर पारिवारिक ज़िम्मेदारियां हैं तथा वह पहले ही जेल में काफ़ी समय बिता चुका है।

हालांकि, अदालत ने नरमी दिखाने से यह कहते हुए इनकार किया कि अपराध की प्रकृति—ड्यूटी पर तैनात एक पुलिस अधिकारी पर हथियारों से किया गया हमला—गंभीर थी। अदालत ने अपीलकर्ता के आचरण और पिछले रिकॉर्ड पर भी ध्यान दिया, जिसमें हिरासत के दौरान उसका व्यवहार भी शामिल था।

यह मानते हुए कि कोई भी नरम करने वाला कारक (Mitigating Factor) हस्तक्षेप को उचित नहीं ठहराता, अदालत ने दोषसिद्धि और सज़ा दोनों बरकरार रखी।

तदनुसार, अपील खारिज की गई और अपीलकर्ता को तत्काल आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया।

Case title: Ajay @ Shantu v. State

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