सह-दोषियों को एक साथ पैरोल/फरलो देने पर पूर्ण रोक नहीं, उपयुक्त मामलों में मिल सकती है राहत: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-30 07:49 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सह-दोषियों को एक साथ पैरोल या फरलो दिए जाने पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है।

अदालत ने कहा कि उपयुक्त परिस्थितियों में सक्षम प्राधिकारी कड़ी जांच के बाद ऐसी राहत प्रदान कर सकता है।

जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंद्र दुडेजा की खंडपीठ उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें दिल्ली कारागार नियम, 2018 के नियम 1212 की टिप्पणी (2) और नियम 1224 की टिप्पणी (1) को चुनौती दी गई। इन प्रावधानों में कहा गया है कि सह-अभियुक्तों को एक साथ पैरोल या फरलो देना “सामान्यतः अनुमेय नहीं” है।

याचिकाकर्ताओं जिन्हें हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया, उन्होंने अदालत का दरवाजा तब खटखटाया जब उनकी फरलो याचिकाएं यह कहकर खारिज की गईं कि उनके सह-दोषियों को पहले ही रिहाई मिल चुकी है।

उनका तर्क था कि इन नियमों की ऐसी व्याख्या की जा रही है मानो सह-दोषियों की एक साथ रिहाई पर पूर्ण प्रतिबंध हो, जिससे पैरोल और फरलो की मूल भावना ही समाप्त हो जाती है।

हाईकोर्ट ने नियमों की वैधता बरकरार रखी, लेकिन यह स्पष्ट किया कि उनमें प्रयुक्त शब्द सामान्यतः स्वयं दर्शाता है कि यह पूर्ण निषेध नहीं है।

अदालत ने कहा,

“सक्षम प्राधिकारी के लिए सह-अभियुक्तों को एक साथ पैरोल/फरलो देने पर कोई पूर्ण रोक नहीं है, किंतु ऐसे मामलों में आवेदन का अधिक कठोर परीक्षण किया जाना चाहिए।”

खंडपीठ ने कहा कि यदि इन नियमों को पूर्ण प्रतिबंध के रूप में पढ़ा जाए तो पैरोल और फरलो की सुधारात्मक व्यवस्था का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा, जिसका मकसद बंदियों को सामाजिक संबंध बनाए रखने और पुनर्वास का अवसर देना है।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य के कर्तव्य अपराधियों को दंडित करने और समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा बंदियों के गरिमापूर्ण जीवन और सामाजिक संबंध बनाए रखने के अधिकार के बीच संतुलन आवश्यक है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सक्षम प्राधिकारी को विवेकाधिकार का प्रयोग अत्यंत सावधानी से करना होगा और यह देखना होगा कि एक साथ रिहाई से सार्वजनिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, गवाहों को प्रभावित करने या अपराध दोहराने की आशंका न हो।

अदालत ने कहा कि यद्यपि सह-दोषियों की एक साथ रिहाई सामान्यतः हतोत्साहित की जाती है, लेकिन विशेष परिस्थितियों जैसे अत्यंत ठोस आधार होने पर या बड़ी संख्या में सह-दोषियों के कारण क्रमिक रिहाई व्यावहारिक न होने पर ऐसी अनुमति दी जा सकती है।

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने याचिका का निस्तारण किया।

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