बिना अवैध सरकारी लाभ से स्पष्ट संबंध के धन प्राप्ति को रिश्वत नहीं माना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-30 07:29 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी लोकसेवक द्वारा धन प्राप्त करना मात्र, भले ही उसका संतोषजनक स्पष्टीकरण न दिया गया हो, तब तक रिश्वत नहीं माना जा सकता जब तक यह स्पष्ट रूप से सिद्ध न हो जाए कि वह राशि किसी अवैध सरकारी लाभ या पक्षपात के बदले दी गई थी।

जस्टिस संजीव नरूला ने यह टिप्पणी करते हुए केंद्रीय भंडारण निगम (CWC) के एक अधिकारी को सेवा से हटाने का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर भ्रष्टाचार का आरोप टिकाऊ नहीं है।

याचिकाकर्ता केंद्रीय भंडारण निगम में वरिष्ठ सहायक प्रबंधक के पद पर कार्यरत थे। उसको विभागीय कार्यवाही के बाद सेवा से हटा दिया गया था। उनके विरुद्ध अवैध रिश्वत लेने, कार्य में लापरवाही और दुराचार सहित तीन आरोप लगाए गए।

बसे गंभीर आरोप यह था कि अधिकारी ने गोदाम से माल उठाने वाले पक्षों से अवैध धनराशि प्राप्त की तथा एक व्यापारी के प्रतिनिधि से 75 हजार रुपये अपने बैंक खाते में प्राप्त किए।

जांच अधिकारी ने आरोपों के कुछ हिस्सों को सिद्ध माना था, जिसके बाद विभागीय प्राधिकारी ने रिश्वत का आरोप स्थापित मानते हुए अधिकारी को सेवा से हटाने की सजा दी। अपीलीय स्तर पर भी इस निर्णय को बरकरार रखा गया।

हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने पाया कि रिश्वत का निष्कर्ष केवल अधिकारी के खाते में 75 हजार रुपये स्थानांतरित होने के आधार पर निकाला गया, जबकि यह साबित करने के लिए कोई ठोस सामग्री नहीं थी कि यह राशि किसी गलत सरकारी लाभ से जुड़ी थी।

अदालत ने कहा,

"अस्पष्ट या अपर्याप्त रूप से समझाई गई धनराशि अपने आप रिश्वत का स्वरूप नहीं ले लेती, जब तक उसके और आरोपित अवैध लाभ के बीच तार्किक साक्ष्य संबंध स्थापित न हो।"

अन्य आरोपों पर हाईकोर्ट ने कहा कि ड्यूटी के दौरान सोने का आरोप भी निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हुआ और इस संबंध में रिकॉर्ड में परस्पर विरोधी विवरण मौजूद थे। वहीं मुख्यालय छोड़ने तथा तौल केंद्र पर अस्थायी कर्मचारी लगाने जैसे आरोप अधिकतम सीमित प्रशासनिक लापरवाही के दायरे में आते हैं।

अदालत ने कहा कि जब भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप टिक नहीं पाया, तब शेष आरोप इतने गंभीर नहीं थे कि सेवा से हटाने जैसी कठोर सजा उचित ठहराई जा सके।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अधिकारी की सेवा में बहाली का आदेश देते हुए निरंतर सेवा लाभ भी प्रदान करने का निर्देश दिया।

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