लगातार जेल में रहने के दौरान दर्ज दोषसिद्धि कैदी को 'आदतन अपराधी' नहीं बना सकती: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-01-09 04:59 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई कैदी लगातार जेल में हो तो उस दौरान दर्ज दोषसिद्धि दिल्ली जेल नियम, 2018 के तहत फरलो देने से इनकार करने के मकसद से कैदी को "आदतन अपराधी" नहीं बना सकती।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने यह टिप्पणी एक उम्रकैद की सज़ा पाए कैदी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में दिल्ली जेल नियमों के नियम 1223(ii) के तहत आदतन अपराधी होने के आधार पर उसकी फरलो याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता अक्टूबर, 2007 से लगातार न्यायिक हिरासत में है। उसने पारिवारिक संबंध बनाए रखने और लंबे समय तक जेल में रहने के तनाव को कम करने के लिए फरलो मांगा था।

हालांकि, सितंबर, 2025 में जेल अधिकारियों ने उसकी याचिका इस आधार पर खारिज कर दी कि उसे कई मामलों में दोषी ठहराया गया था। इसलिए आदतन अपराधी होने के कारण वह फरलो के लिए अयोग्य है।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह अस्वीकृति "आदतन अपराधी" शब्द की गलत समझ पर आधारित है, खासकर सुकन्या शांता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद सरकार द्वारा जारी संशोधित परिभाषा के आलोक में।

संशोधित परिभाषा के अनुसार, किसी व्यक्ति को पांच साल की लगातार अवधि के भीतर दो से अधिक बार दोषी ठहराया जाना चाहिए और जेल की सज़ा सुनाई जानी चाहिए, जिसमें जेल में बिताया गया कोई भी समय शामिल नहीं है।

संशोधित परिभाषा की जांच करने के बाद कोर्ट इस बात पर सहमत हुआ कि पांच साल की उक्त अवधि की गणना करते समय जेल में बिताया गया कोई भी समय, चाहे वह सज़ा के तहत हो या हिरासत में, उसे बाहर रखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा,

"एक बार जब (परिभाषा के) प्रावधान को लागू किया जाता है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि परिभाषा एक ऐसी स्थिति की कल्पना करती है, जहां एक व्यक्ति आज़ाद रहते हुए पांच साल की अवधि के भीतर दो से अधिक बार दोषी ठहराया जाता है और उसे जेल की सज़ा सुनाई जाती है।"

इस व्याख्या को तथ्यों पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों द्वारा जिन सभी दोषसिद्धियों पर भरोसा किया गया, वे याचिकाकर्ता को 2007 में हिरासत में लिए जाने के बाद दर्ज की गईं।

एक बार जब जेल में बिताए गए समय को बाहर कर दिया गया तो ऐसी कोई लगातार पांच साल की अवधि नहीं थी जिसके दौरान याचिकाकर्ता को दो से अधिक बार दोषी ठहराया गया हो और जेल की सज़ा सुनाई गई हो।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम के तहत परिकल्पित पांच साल की अवधि दोषसिद्धि और सज़ा के चरण से जुड़ी है, न कि केवल अपराध करने से।

इसमें बताया गया,

"अगर राज्य द्वारा दी गई व्याख्या को अपनाया जाता है - तो इसका मतलब होगा कि अगर कोई व्यक्ति साल 2000, 2001 और 2002 में अपराध करता है, लेकिन उसे क्रमशः 2005, 2012 और 2018 में दोषी ठहराया जाता है तो उसे अपराध करने की तारीखों के आधार पर आदतन अपराधी माना जाएगा, भले ही दोषसिद्धि कई सालों में हुई हो, न कि पाँच साल की अवधि में।"

दूसरी ओर, कोर्ट ने आगे कहा,

"अगर कोई व्यक्ति साल 2000, 2007 और 2008 में अपराध करता है और उसे 2011, 2012 और 2013 में दोषी ठहराया जाता है तो उसे आदतन अपराधी नहीं माना जाएगा, भले ही दोषसिद्धि पाँच साल की अवधि के भीतर दर्ज की गई हो। इस कोर्ट की राय में ऐसी व्याख्या 'आदतन अपराधी' की परिभाषा के स्पष्ट शब्दों के सीधे विरोधाभास में होगी, जो स्पष्ट रूप से पांच साल की लगातार अवधि के भीतर 'दोषसिद्धि और सज़ा' पर ज़ोर देती है।"

इस तरह कोर्ट ने विवादित अस्वीकृति आदेश रद्द कर दिया और मामले को चार हफ़्तों के भीतर पुनर्विचार के लिए सक्षम अधिकारी को वापस भेज दिया।

Case title: Vinod @ Vinode @ Bhole v. The State (Govt Of Nct) Delhi

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