आपसी सहमति से 'शादी की कसम' खाने वाले बालिग़ों को आज़ादी से रहने का हक़, सुरक्षा के भी हक़दार: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-04-17 04:46 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से 'शादी की मानसिक कसम' खाने वाले बालिग़ों को आज़ादी और गरिमा के साथ रहने का हक़ है। साथ ही उन्हें अपने परिवार से मिलने वाली धमकियों से सुरक्षा मिलनी चाहिए।

एक ऐसे जोड़े को पुलिस सुरक्षा देते हुए, जिन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार शादी की, जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा:

"याचिकाकर्ता बालिग़ हैं और आपसी सहमति से अपनी मर्ज़ी से फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद हैं, चाहे वह अपने जीवनसाथी को चुनने का फ़ैसला ही क्यों न हो।"

कोर्ट ने कहा,

"ऐसा करने के बाद, और शादी की मानसिक कसम खाने के बाद उन्हें भारत के संविधान के भाग III के तहत गारंटीशुदा आज़ादी और गरिमा के साथ अपना जीवन जीने का पूरा-पूरा हक़ है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि इस जोड़े को किसी भी व्यक्ति से, चाहे वह समाज का हो या आम जनता का—जिसमें उनके माता-पिता, रिश्तेदार और दोस्त भी शामिल हैं—देखभाल और सुरक्षा पाने का भी हक़ है।

कोर्ट एक ऐसे जोड़े की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने महिला के पिता से अपनी जान और शरीर को होने वाले ख़तरे से सुरक्षा की गुहार लगाई।

याचिका में कहा गया कि वे दोनों बालिग़ हैं और उन्होंने अपनी मर्ज़ी और इच्छा से आपस में शादी की।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि महिला के पिता लगातार उन्हें डरा-धमका रहे हैं। उन्हें गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने की धमकियां दे रहे हैं, जिससे उनके जीवन और व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार में दखल पड़ रहा है।

याचिका मंज़ूर करते हुए कोर्ट ने इस जोड़े को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने SHO और संबंधित बीट कांस्टेबल को निर्देश दिया कि वे क़ानून के अनुसार, जब भी ज़रूरत हो, इस जोड़े को उचित सहायता और सुरक्षा देने के लिए हर संभव कदम उठाएं।

कोर्ट ने कहा,

"यह साफ़ किया जाता है कि अगर याचिकाकर्ता किसी दूसरे पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र में रहने का फ़ैसला करते हैं तो वे इस बारे में संबंधित पुलिस स्टेशन के SHO को सूचित करेंगे और जगह बदलने के तीन दिनों के भीतर उन्हें अपना पूरा पता और अन्य विवरण देंगे। संबंधित SHO भी क़ानून के अनुसार, जब भी याचिकाकर्ताओं को ज़रूरत हो, उन्हें उचित सहायता और सुरक्षा देने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे।"

Title: KIRTI AND ANR v. STATE OF NCT OF DELHI AND ORS

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