दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मामलों में केवल अधिक उम्र होने के आधार पर किसी गृहिणी को घर के कामकाज और परिवार की देखभाल के लिए दी जाने वाली अवैतनिक सेवाओं के बदले मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि बुजुर्ग महिलाएं भी घर के कामकाज, बच्चों और पोते-पोतियों की देखभाल सहित परिवार के लिए कई तरह की सेवाएं देती रहती हैं। केवल इसलिए उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि इसके बदले उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता।

जस्टिस अनीश दयाल ने कहा कि सेवाओं के बदले आर्थिक भुगतान नहीं होने का लाभ दुर्घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता और न ही इससे घायल व्यक्ति को मिलने वाले उचित मुआवजे में कमी की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी 74 वर्षीय गंगा देवी को दिए जाने वाले मुआवजे में वृद्धि करते हुए की। फरवरी 2019 में एक बस उनके पैरों के ऊपर से गुजर गई थी, जिससे उनके दोनों पैरों में 74 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता हो गई। हादसे के कारण उनका बायां पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा, जबकि दाएं पैर की सभी उंगलियां भी काटनी पड़ीं।

मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण ने गंगा देवी को 14.42 लाख रुपये का मुआवजा दिया था लेकिन आय के नुकसान और भविष्य की आय में कमी के लिए कोई राशि देने से इनकार कर दिया। न्यायाधिकरण का तर्क था कि वह बुजुर्ग गृहिणी थीं और उन्होंने कभी नौकरी नहीं की थी।

इस आदेश को खारिज करते हुए जस्टिस दयाल ने कहा कि कानून में ऐसी कोई उम्र सीमा निर्धारित नहीं है जिसके बाद घर के कामकाज, बिना भुगतान की देखभाल और परिवार के लिए दी जाने वाली अन्य सेवाओं के आर्थिक मूल्य को मुआवजे की गणना में शामिल नहीं किया जा सके।

अदालत ने कहा कि इन सेवाओं के मुआवजे के सिद्धांत में उम्र के आधार पर प्रतिबंध लगाना मोटर वाहन अधिनियम के कल्याणकारी उद्देश्य और उचित एवं न्यायसंगत मुआवजा देने की मूल आवश्यकता के विपरीत होगा।

हाईकोर्ट ने यह भी आगाह किया कि केवल अधिक उम्र होने के कारण यह मान लेना गलत है कि कोई व्यक्ति अब परिवार में योगदान नहीं देता। अदालत के अनुसार, ऐसा नजरिया बुजुर्गों के प्रति पूर्वाग्रह को बढ़ावा दे सकता है, जिसे उम्र के आधार पर भेदभाव कहा जाता है।

गंगा देवी की काल्पनिक मासिक आय 16,962 रुपये निर्धारित की गई। यह राशि दुर्घटना के समय दिल्ली में कुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के अनुरूप है।

अदालत ने ध्यान दिया कि गंगा देवी संयुक्त परिवार में रहती थीं और अपने पोते-पोतियों की देखभाल में भी शामिल थीं। दिव्यांगता के कारण उनकी चलने-फिरने की क्षमता ही प्रभावित नहीं हुई, बल्कि घर के काम करने और परिवार के सदस्यों की देखभाल करने की क्षमता पर भी असर पड़ा।

हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि गंगा देवी के दोनों निचले अंगों से संबंधित शारीरिक दिव्यांगता 74 प्रतिशत प्रमाणित की गई है, लेकिन उनकी अधिक उम्र और घरेलू गतिविधियों तथा परिवार के लिए अवैतनिक सेवाएं देने की क्षमता पर पड़े प्रभाव को देखते हुए उनकी कार्यात्मक दिव्यांगता 50 प्रतिशत मानी जानी चाहिए।

अदालत ने दोहराया कि मुआवजे का आकलन रूढ़िवादी धारणाओं या इस अनुमान पर आधारित नहीं होना चाहिए कि अधिक उम्र होने के बाद व्यक्ति परिवार के लिए योगदान देना बंद कर देता है। मुआवजे का निर्धारण करते समय बुजुर्गों के प्रति मौजूद पूर्वाग्रहों को ध्यान में रखना और यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वे आकलन को प्रभावित न करें।

हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध आंकड़े भी दर्शाते हैं कि 70 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं अपने परिवारों के लिए घरेलू कामकाज और देखभाल सहित कई तरह की अवैतनिक सेवाएं देती रहती हैं।

अदालत ने कहा कि गंगा देवी द्वारा गृहिणी के रूप में दी जाने वाली सेवाओं और पोते-पोतियों की देखभाल को देखते हुए उनकी काल्पनिक आय दुर्घटना के समय दिल्ली में कुशल श्रमिकों के लिए लागू न्यूनतम मजदूरी के आधार पर निर्धारित करना उचित है। उनके आधार कार्ड के अनुसार वह दिल्ली की निवासी थीं, इसलिए उनकी मासिक आय 16,962 रुपये मानी गई।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दैनिक जीवन में सहायता की जरूरत होने पर केवल इस आधार पर मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी भुगतान किए जाने वाले सहायक को नियुक्त करने का प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

अदालत ने कहा कि परिवार के सदस्य बिना किसी भुगतान के ऐसी सहायता दे सकते हैं, लेकिन इससे उनकी सेवाओं का मूल्य समाप्त नहीं हो जाता।

इसी आधार पर अदालत ने सहायक के खर्च के लिए दिया जाने वाला मुआवजा 50,000 रुपये से बढ़ाकर पांच लाख रुपये कर दिया। उपचार और अस्पताल में भर्ती रहने के तीन महीनों के दौरान आय के नुकसान के लिए 50,886 रुपये तथा भविष्य की आय के नुकसान के लिए 5,08,860 रुपये दिए। भविष्य की आय के नुकसान की गणना में पांच का गुणक और 50 प्रतिशत कार्यात्मक दिव्यांगता को आधार बनाया गया।

अदालत ने दर्द और पीड़ा के लिए मुआवजे की राशि भी 75,000 रुपये से बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी। इसके अलावा, एक अतिरिक्त कृत्रिम पैर की लागत के लिए 1.30 लाख रुपये और उसके रखरखाव के लिए 75,000 रुपये देने का आदेश दिया, जो निर्धारित शर्तों के अधीन होगा।

इन संशोधनों के बाद हाईकोर्ट ने गंगा देवी का कुल मुआवजा 14.42 लाख रुपये से बढ़ाकर 20,79,307 रुपये कर दिया। अदालत ने मुआवजे पर 7.5 प्रतिशत सालाना ब्याज की दर बरकरार रखी।


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