अनुकंपा नियुक्ति सार्वजनिक रोज़गार का वैकल्पिक तरीका नहीं बन सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फिर दोहराया कि अनुकंपा नियुक्ति को सार्वजनिक रोज़गार के वैकल्पिक तरीके या किसी मृत कर्मचारी के परिवार के लंबे समय तक चलने वाले आर्थिक पुनर्वास के साधन के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
जस्टिस शैल जैन ने यह टिप्पणी BSES यमुना पावर लिमिटेड की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए की। इस याचिका में कंपनी ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें कंपनी को एक मृत कर्मचारी के बेटे को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने पर विचार करने का निर्देश दिया गया।
कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के 2014 का फ़ैसला रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति की मांग लगभग साढ़े छह साल की बिना किसी वजह के हुई देरी के बाद उठाई गई। साथ ही यह कि परिवार उस समय किसी ऐसी तत्काल आर्थिक तंगी में नहीं था, जैसा कि लागू योजना के तहत माना जाता है।
मृत कर्मचारी पहले दिल्ली विद्युत बोर्ड में लाइनमैन था और उसकी सेवाएं बाद में BSES को हस्तांतरित हो गई थीं। उकी अगस्त 2003 में काम के दौरान बिजली का झटका लगने से मौत हो गई थी। उसके परिवार को पारिवारिक पेंशन के अलावा, सेवा समाप्ति और वैधानिक लाभों के तौर पर 7 लाख रुपये से ज़्यादा की रकम मिली थी।
कर्मचारी के बेटे ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए फ़रवरी 2010 में ही आवेदन किया। कंपनी ने उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया, जिसके बाद यह विवाद इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल तक पहुंचा। ट्रिब्यूनल ने दावा करने वाले के पक्ष में फ़ैसला सुनाया और नियोक्ता को निर्देश दिया कि वह उसके मामले पर उसकी योग्यता के आधार पर विचार करे।
ट्रिब्यूनल का फ़ैसला रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अनुकंपा नियुक्ति अनुच्छेद 14 और 16 के तहत सार्वजनिक रोज़गार में समानता के संवैधानिक आदेश का केवल एक अपवाद है। इसे एक निहित अधिकार के तौर पर नहीं मांगा जा सकता।
इस मामले में 'केनरा बैंक बनाम अजितकुमार जी.के. (2025)' मामले का हवाला दिया गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया था कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य केवल उन परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता देना है, जिन्हें काम के दौरान कर्मचारी की मृत्यु हो जाने के कारण अचानक आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
कोर्ट ने पाया कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद भी परिवार कई वर्षों तक अपना गुज़ारा करने में सफल रहा था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दावा करने वाले ने खुद ही जिरह के दौरान यह स्वीकार किया कि अनुकंपा नियुक्ति की मांग करने से पहले वह पहले से ही किसी लाभकारी रोज़गार में लगा हुआ था।
इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने यह टिप्पणी की:
“अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य किसी मृत कर्मचारी के परिवार के लिए वित्तीय उन्नति या दीर्घकालिक आर्थिक पुनर्वास का साधन बनना नहीं है। इसका उद्देश्य पूरी तरह से उस परिवार को तत्काल सहायता प्रदान करने तक सीमित है, जो अपने कमाने वाले सदस्य की असमय मृत्यु के कारण अचानक संकट में आ गया हो। इसे सार्वजनिक रोज़गार के एक वैकल्पिक माध्यम का रूप धारण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
न्यायालय ने आगे कहा कि सहानुभूति संबंधी विचार, सार्वजनिक रोज़गार को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक आदेश या लागू योजना में निहित स्पष्ट शर्तों पर हावी नहीं हो सकते।
अतः, न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के निर्णय को “स्पष्ट रूप से अवैध” करार दिया और उसे रद्द कर दिया।
Case title: M/S BSES Yamuna Power Ltd. v. Vinod Kumar