'प्रक्रियात्मक कानून के दुरुपयोग का क्लासिक मामला': दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 से ट्रायल में देरी करने पर आरोपी पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक आरोपी पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया, क्योंकि वह 2016 से चल रहे एक आपराधिक ट्रायल को बार-बार रोकने की कोशिश कर रहा था। कोर्ट ने इस मामले को "प्रक्रियात्मक कानून के दुरुपयोग का एक क्लासिक मामला" बताया।
जस्टिस गिरीश कथपालिया ने आरोपी द्वारा दायर याचिका खारिज की। इस याचिका में आरोपी ने ट्रायल कोर्ट और सेशंस कोर्ट के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें जुलाई 2016 में शुरू हुए आपराधिक शिकायत मामले में शिकायतकर्ता से क्रॉस एग्जामिनेशन करने का उसका मौका खत्म कर दिया गया।
कोर्ट ने पाया कि आरोपी को ट्रायल कोर्ट और ऊपरी अदालतों, दोनों से बार-बार रियायतें दी गईं, लेकिन वह उन मौकों का फायदा उठाने में नाकाम रहा।
मुकदमे के इतिहास को देखते हुए कोर्ट ने दर्ज किया कि दिसंबर 2016 में ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने के बाद आरोपी ने जुलाई 2017 में CrPC की धारा 251 के तहत नोटिस जारी होने से पहले कई बार सुनवाई टलवाई। इसके बाद भी कई मौके मिलने के बावजूद वह शिकायतकर्ता से जिरह करने में बार-बार नाकाम रहा।
हाईकोर्ट ने पाया कि फरवरी 2020 में आरोपी को आखिरकार भगोड़ा घोषित कर दिया गया। हालांकि उस आदेश और क्रॉस एग्जामिनेशन करने का उसका अधिकार खत्म करने वाले पिछले आदेश को बाद में 2022 में हाईकोर्ट ने रद्द किया।
हालांकि, नए मौके मिलने के बावजूद, आरोपी फिर से शिकायतकर्ता से जिरह करने में नाकाम रहा, जिसके चलते मई 2023 में ट्रायल कोर्ट ने एक बार फिर उसका मौका खत्म किया।
आरोपी फिर से सेशंस कोर्ट गया, जिसने ₹10,000 का जुर्माना भरने की शर्त पर उसे एक और मौका दिया। हालांकि, तब भी, वह सुनवाई की अगली तारीख पर ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं हुआ।
हाईकोर्ट ने आगे पाया कि सेशंस कोर्ट में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देते समय आरोपी ने एक झूठा बहाना बनाया। उसने दावा किया कि वह कोर्ट में इसलिए पेश नहीं हो सका, क्योंकि उसे अपने मामा को अस्पताल में भर्ती कराना था, क्योंकि मामा का बेटा शहर में नहीं था।
सेशंस कोर्ट ने अस्पताल के रिकॉर्ड से पता लगाया कि मामा का बेटा असल में अस्पताल में ही मौजूद था, जिससे आरोपी का यह बहाना झूठा साबित हो गया। आरोपी ने रिवीजन याचिका दायर करने में हुई देरी को माफ़ करने की भी गुहार लगाई, जिसका आधार यह था कि उसकी बेटी की मौत से उसे मानसिक कष्ट हुआ था। हालांकि, सेशंस कोर्ट ने पाया कि बेटी की मौत याचिका में बताए गए समय से लगभग एक साल पहले ही हो चुकी थी।
इस प्रकार, इस चुनौती को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह प्रक्रियात्मक कानून के दुरुपयोग का एक स्पष्ट मामला है, जिसमें याचिकाकर्ता बार-बार आपराधिक शिकायत मामले के ट्रायल को रोकने की कोशिश कर रहा है... याचिकाकर्ता को सेशंस कोर्ट के साथ-साथ इस कोर्ट द्वारा भी बार-बार रियायतें दी गईं और मामले को बार-बार वापस भेजा गया, लेकिन याचिकाकर्ता ने उन रियायतों का लाभ उठाना उचित नहीं समझा। इतना ही नहीं, याचिकाकर्ता ने सेशंस कोर्ट के सामने पूरी तरह से झूठे तथ्य भी पेश किए।”
कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि यह याचिका न केवल गुण-दोष के आधार पर कमज़ोर थी, बल्कि यह ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को अनिश्चित काल तक खींचने का एक शरारतपूर्ण प्रयास भी था, इस उम्मीद में कि प्रतिवादी/शिकायतकर्ता हताश होकर इस कानूनी लड़ाई को छोड़ देगा।”
यह मानते हुए कि विवादित आदेशों में कोई कमी नहीं थी, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की और आरोपी को निर्देश दिया कि वह एक सप्ताह के भीतर दिल्ली हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज़ कमेटी के पास ₹50,000 जमा करे।
Case title: Azad Saifi v. Akhtar Ali