केंद्रीय सचिवालय क्लब ने मान्यता रद्द करने और बेदखली के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में दी चुनौती

Update: 2026-08-01 10:35 GMT

107 वर्ष पुराने केंद्रीय सचिवालय क्लब ने केंद्र सरकार द्वारा उसकी मान्यता रद्द करने और परिसर खाली कराने के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। क्लब ने इन आदेशों को मनमाना, असंवैधानिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया।

एडवोकेट नकुल गांधी के माध्यम से दायर याचिका में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग द्वारा 14 जुलाई को जारी मान्यता रद्द करने के आदेश और 17 जुलाई को संपदा अधिकारी द्वारा पारित बेदखली आदेश को रद्द करने की मांग की गई।

याचिका के अनुसार इन आदेशों के आधार पर 21 जुलाई को अधिकारियों ने क्लब के परिसर का कब्जा भी अपने हाथ में ले लिया।

मामले की सुनवाई सोमवार को जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ के समक्ष होगी।

याचिका में कहा गया कि केंद्रीय सचिवालय क्लब, जिसे पहले टॉकीटोरा क्लब के नाम से जाना जाता था वर्ष 1919 में स्थापित एक ऐतिहासिक संस्था है। क्लब का कहना है कि उसकी मान्यता रद्द करने और बेदखल करने के आदेश पूरी तरह मनमाने और संविधान के विपरीत हैं।

क्लब के अनुसार विवाद की शुरुआत मार्च 2023 में हुई, जब कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने क्लब के चुनाव कराने के लिए केवल दो महीने के लिए एक तदर्थ प्रशासनिक समिति का गठन किया। याचिका में आरोप लगाया गया कि यह समिति अपने सीमित कार्यकाल के बावजूद करीब दो वर्षों तक बनी रही और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कई वित्तीय तथा प्रशासनिक अनियमितताएं कीं।

याचिका में दावा किया गया कि समिति के कार्यकाल में वस्तु एवं सेवा कर रिटर्न समय पर दाखिल नहीं किए गए, वैधानिक देयताओं का भुगतान नहीं हुआ, बार संचालन में अनियमितताएं हुईं, जरूरी अभिलेखों का रखरखाव नहीं किया गया, कर रिटर्न दाखिल नहीं किए गए अवैध भुगतान किए गए कर्मचारियों को मनमाने ढंग से निलंबित किया गया और सदस्यता सत्यापन के नाम पर कई सदस्यों के नाम हटा दिए गए।

क्लब का आरोप है कि इन गंभीर शिकायतों पर कार्रवाई करने के बजाय केंद्र सरकार ने बिना कारण बताओ नोटिस जारी किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए पहले 24 फरवरी को एक कार्यालय ज्ञापन के जरिए उसकी मान्यता समाप्त करने का प्रयास किया।

याचिका में कहा गया कि दिल्ली हाईकोर्ट के 2 अप्रैल 2026 के आदेश के बाद क्लब ने 6 अप्रैल 2026 को विस्तृत जवाब दाखिल कर तदर्थ समिति की कथित अनियमितताओं और विफलताओं का पूरा विवरण दिया था। इसके बावजूद विभाग ने उन तथ्यों की अनदेखी करते हुए पहले जैसे ही आरोप दोहराकर नया आदेश पारित कर दिया।

क्लब का कहना है कि यह कार्रवाई पहले से तय, यांत्रिक और दुर्भावनापूर्ण तरीके से की गई ताकि विभाग द्वारा नियुक्त तदर्थ समिति को संभावित आपराधिक और प्रशासनिक जांच से बचाया जा सके।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि अधिकारी अपनी ही प्रशासनिक विफलताओं और तदर्थ समिति की कथित गलतियों का इस्तेमाल करते हुए इस ऐतिहासिक संस्था को जबरन उसके परिसर से बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं। क्लब का कहना है कि यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।

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