कन्फर्म टिकट के बावजूद सीट नहीं मिली, खड़े होकर सफर करने पर रेलवे को मुआवजा देने का आदेश

Update: 2026-06-04 10:58 GMT

भोजपुर (आरा) जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने कन्फर्म आरक्षित टिकट होने के बावजूद यात्रियों को उनकी सीटें उपलब्ध नहीं कराने के मामले में उत्तर मध्य रेलवे और रेल मंत्रालय को सेवा में कमी (Deficiency in Service) का दोषी ठहराया है। आयोग ने रेलवे को टिकट राशि वापस करने के साथ मुआवजा और मुकदमेबाजी खर्च देने का निर्देश दिया।

मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता ने अपने तीन मित्रों के साथ विंध्याचल से आरा लौटने के लिए ट्रेन संख्या 13202 एलटीटी–पटना एक्सप्रेस में आईआरसीटीसी के माध्यम से चार कन्फर्म टिकट बुक किए थे। यात्रियों को कोच बी-4 में सीट संख्या 58, 62, 63 और 68 आवंटित की गई थी, जिसके लिए कुल ₹1,876.80 का किराया चुकाया गया था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि ट्रेन में चढ़ने पर उनकी आरक्षित सीटों पर कुछ लोग बैठे मिले, जिन्होंने खुद को रेलवे कर्मचारी बताया। सीट खाली करने के अनुरोध के बावजूद उन्होंने सीट नहीं छोड़ी। शिकायतकर्ता ने बताया कि उन्हें न तो टीटीई मिला और न ही रेलवे सुरक्षा बल का कोई कर्मचारी। रेलवे हेल्पलाइन 139 पर संपर्क करने का प्रयास भी सफल नहीं हुआ।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने रेलवे सेवा पोर्टल और रेल मंत्रालय के सोशल मीडिया माध्यमों से शिकायत दर्ज कराई। शिकायत संख्या जारी होने के बावजूद कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई और शिकायतकर्ता व उसके साथियों को पूरी यात्रा खड़े होकर करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने सेवा में कमी का आरोप लगाते हुए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

रेलवे अधिकारियों ने दलील दी कि कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी सरकारी रेलवे पुलिस (GRP) की है और रेलवे प्रशासन की ओर से शिकायत पर त्वरित कार्रवाई की गई थी। हालांकि आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता के पास वैध कन्फर्म टिकट और आरक्षित सीटें थीं, फिर भी रेलवे उन्हें सीट उपलब्ध कराने में विफल रहा।

आयोग के अध्यक्ष कृष्ण प्रताप सिंह और सदस्य कमल किशोर सिंह ने कहा कि आरक्षित सीटों पर यात्रा न कर पाने के कारण शिकायतकर्ता और उसके साथियों को मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न झेलना पड़ा। आयोग ने इसे रेलवे की सेवा में स्पष्ट कमी माना।

आयोग ने उत्तर मध्य रेलवे और रेल मंत्रालय को निर्देश दिया कि वे टिकट राशि ₹1,876.80 को 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित वापस करें। इसके अलावा मानसिक, शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न के लिए ₹20,000 तथा वाद व्यय के रूप में ₹15,000 का भुगतान करें। आयोग ने आदेश दिया कि 60 दिनों के भीतर राशि का भुगतान न करने पर उस पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देय होगा।

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