उधारकर्ता की सहमति बिना तीसरे पक्ष को ऋण देने पर बैंक दोषी: उपभोक्ता आयोग
कुपवाड़ा जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जम्मू-कश्मीर बैंक को सेवा में कमी (deficiency in service) का दोषी ठहराया। आयोग ने पाया कि बैंक ने शिकायतकर्ता की सहमति के बिना ऋण राशि का एक हिस्सा तीसरे पक्ष को जारी कर दिया, जो पूरी तरह अवैध और मनमाना कदम था।
आयोग, जिसकी अध्यक्षता पीरज़ादा क़ौसर हुसैन (अध्यक्ष) और सदस्य सुश्री नायला यासीन ने की, ने यह भी कहा कि बिना वैध वितरण के पूरे ऋण पर EMI वसूलना और रिकवरी प्रक्रिया शुरू करना सेवा में कमी के दायरे में आता है।
मामले के तथ्य
शिकायतकर्ता नासिर उद दीन ज़रगर को पीएमईजीपी योजना के तहत जम्मू-कश्मीर बैंक की ओल्ड चौक, कुपवाड़ा शाखा से ₹10 लाख का ऋण स्वीकृत हुआ था।
इसमें से ₹1.20 लाख की राशि जीएसटी बिल के आधार पर उन्हें दी गई, जबकि बाकी राशि बैंक के पास ही रही।
शिकायतकर्ता ने आगे किसी अतिरिक्त भुगतान के लिए न तो सहमति दी और न ही बैंक से संपर्क किया। इसके बावजूद बैंक ने ₹6.05 लाख की राशि अल नवाफ फार्मा नामक तीसरे पक्ष को बिना सहमति और उचित दस्तावेजों के जारी कर दी।
इसके अलावा, आरोप है कि ₹2 लाख की राशि गारंटर के खातों से भी काट ली गई।
शिकायत और बैंक का पक्ष
शिकायतकर्ता ने बैंक से कई बार संपर्क किया, जहां उन्हें आश्वासन दिया गया कि गारंटर के खाते से कोई कटौती नहीं होगी। इसके बावजूद बैंक ने राशि काट ली, जो RBI दिशानिर्देशों का उल्लंघन बताया गया।
बैंक ने अपने बचाव में कहा कि शिकायत का उद्देश्य केवल बकाया ऋण की वसूली को रोकना और अधिकारियों को परेशान करना है। बैंक ने यह भी दावा किया कि ऋण 2021 में शिकायतकर्ता की सहमति से ही स्वीकृत किया गया था।
आयोग की टिप्पणियां
आयोग ने पाया कि ₹10 लाख के ऋण स्वीकृत होने और केवल ₹1.20 लाख के वितरण पर कोई विवाद नहीं था।
हालांकि, बैंक यह साबित करने में विफल रहा कि उसने शेष राशि तीसरे पक्ष को जारी करने से पहले शिकायतकर्ता की सहमति ली थी।
आयोग ने कहा कि बैंक का यह आचरण लापरवाही और मनमानी को दर्शाता है।
साथ ही यह भी कहा कि बिना वैध वितरण के पूरे ऋण पर EMI लगाना और रिकवरी करना सेवा में कमी है।
आयोग ने स्पष्ट किया कि उधारकर्ता को उस राशि के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, जो उसे मिली ही नहीं।
फैसला
आयोग ने शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निर्देश दिए:
शिकायतकर्ता की देनदारी केवल ₹1.20 लाख (ब्याज सहित) तक सीमित की जाए
गारंटर को अनधिकृत राशि के लिए जिम्मेदार न ठहराया जाए
बैंक संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आंतरिक जांच करे
शेष ऋण राशि RBI दिशानिर्देशों के अनुसार जारी की जाए
गारंटर से काटी गई ₹2 लाख की राशि 5% ब्याज के साथ वापस की जाए