बरी होने मात्र से पूरे बकाया वेतन का अधिकार नहीं मिलता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Update: 2026-05-30 08:41 GMT

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के आधार पर सेवा से बर्खास्त किया गया हो और बाद में वह अपील में बरी हो जाए, तो केवल बरी होने के आधार पर उसे बर्खास्तगी की अवधि का पूरा बकाया वेतन पाने का स्वतः अधिकार नहीं मिल जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में "काम नहीं तो वेतन नहीं" का सिद्धांत लागू होगा।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह फैसला विद्युत मंडल के पूर्व कर्मचारी की अपील खारिज करते हुए दिया।

मामले के अनुसार कर्मचारी को सहायक श्रेणी-1 (सिविल) के पद पर नियुक्त किया गया था और बाद में उसे पर्यवेक्षक (सिविल) पद पर पदोन्नत किया गया। उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत मामला दर्ज हुआ था। विशेष अदालत ने उसे दोषी ठहराया, जिसके बाद सक्षम प्राधिकारी ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया।

दोषसिद्धि के खिलाफ कर्मचारी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। इस दौरान वह रिटायरमेंट की आयु भी पूरी कर चुका था। बाद में हाईकोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे आरोपों से बरी किया। इसके बाद विभाग ने बर्खास्तगी का आदेश वापस ले लिया और उसे काल्पनिक रूप से सेवा में बहाल माना लेकिन बर्खास्तगी से लेकर सेवानिवृत्ति तक की अवधि का वास्तविक वेतन और अन्य आर्थिक लाभ देने से इनकार कर दिया।

कर्मचारी ने इस निर्णय को चुनौती दी लेकिन सिंगल बेंच ने उसकी याचिका खारिज की। पुनर्विचार याचिका भी असफल रहने पर उसने खंडपीठ का रुख किया।

अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि जब दोषसिद्धि अंततः टिक नहीं पाई और उसे सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया, तब उसे उस अवधि का वेतन और भत्ते मिलने चाहिए, जिसके दौरान वह सेवा से बाहर रहा। यह भी कहा गया कि प्रतिकर के सिद्धांत के अनुसार उसे उसी स्थिति में बहाल किया जाना चाहिए, जिसमें वह दोषसिद्धि न होने पर होता।

हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी उस समय प्रभावी और वैध दोषसिद्धि के आधार पर की गई। इसलिए बाद में अपील में बरी हो जाने से दोषसिद्धि के आधार पर पहले से उत्पन्न कानूनी परिणाम स्वतः समाप्त नहीं हो जाते।

अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में स्पष्ट कर चुकी है कि यदि किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के कारण सेवा से हटाया गया हो तो बाद की बरी होने की स्थिति में वह बकाया वेतन का दावा अधिकार के रूप में नहीं कर सकता।

खंडपीठ ने कहा,

"भले ही बरी होना गुण-दोष के आधार पर हुआ हो, इससे उस अवधि का वेतन पाने का अधिकार उत्पन्न नहीं होता, जिसमें कर्मचारी ने कोई सेवा नहीं दी।"

अदालत ने यह भी माना कि संबंधित अवधि में नियोक्ता और कर्मचारी का संबंध बर्खास्तगी आदेश के कारण समाप्त हो चुका था। इसलिए "काम नहीं तो वेतन नहीं" का सिद्धांत पूरी तरह लागू होगा।

इन टिप्पणियों के साथ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारी की अपील खारिज कर दी और बकाया वेतन की मांग स्वीकार करने से इनकार किया।

Tags:    

Similar News